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drbhupendra


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बाबा साहेब आंबेडकर और राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ

Posted On: 13 Apr, 2016  
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पहली बार मोदी सरकार

Posted On: 5 Sep, 2015  
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हिंदुत्व की कसौटी पर नरेंद्र मोदी का आंकलन

Posted On: 1 Sep, 2015  
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सनातनी संतो पर सुनियोजित आक्रमण

Posted On: 26 Aug, 2013  
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माओवादी ! वैचारिक क्रन्तिकारी या संगठित गुंडे?

Posted On: 13 Jun, 2013  
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राजेन्द्र प्रसाद और नेहरु जी के सम्बन्ध

Posted On: 14 May, 2013  
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हेलेन और सोनिया गांधी

Posted On: 27 Apr, 2013  
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कश्मीर की आजादी पर बुद्धिजीविओ से प्रश्न

Posted On: 18 Mar, 2013  
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क्या नग्नता ही स्त्री स्वतंत्रता है ?

Posted On: 1 Jan, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

आदरनीय डॉ. भूपेन्द्र जी, सादर अभिवादन! आपका सम्पूर्ण आलेख विश्लेष्णात्मक है. आपने वस्तुस्थिति को ही सामने रक्खा है. मेरे विचार से जनता बदलाव के पक्ष में है क्योंकि अब उसकी सहनशक्ति जवाब दे चुकी है. दुविधा इसी बात का है कि राहुल गांधी या सोनिया गांधी का विरोध करने वाला कांग्रेस में कोई दिखता नहीं है, दूसरी आशंका जो आपने भी ब्यक्त की है कि कांग्रेस जोड़ तोड़ में माहिर है. उधर भाजपा में मोदी विरोध पार्टी के अन्दर तो है ही एन डी ए में जे डी यु सीना ताने हुए है! ऐसे में जनता को ही तय करना होगा कि भाजपा अधिक से अधिक सीट मिले. मोदी हो या अडवानी एक मौका तो उन्हें मिलना ही चाहिए! मेरी अपनी राय है कि भाजपा को भी हिंदुत्व छोड़ सेक्युलर मुखौटा ओढ़ लेना चाहिए. शिव सेना आदि को थोडा नरम रुख अख्तियार करना चाहिए. जनता के आम मुद्दे - महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून ब्यवस्था, त्वरित न्याय ब्यवस्था पर जोड़ देना चाहिए. अरविन्द केजरीवाल को अपने साथ मिलाने की कोशिश करनी चाहिए या कम से कम उसके आन्दोलन का समर्थन तो करना चाहिए. दिल्ली दुष्कर्म मामले में अभी तक कोई नतीजा नहीं आया, दरिन्दगी बढ़ती जा रही है, पर भाजपा खामोश है, क्या आम जनता को सिर्फ राम मंदिर चाहिए या विद्या का मंदिर, कर्म का मंदिर, साफ़ सुथरा वातावरण भी चाहिए. भूपेन्द्र जी मैं समझता हूँ, आप भी बखूबी समझते हैं, और आप का पेश भी जनसेवा है! संतुलित विचार रखने के लिए आपका आभार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

हमारे कॉलेज में एक कश्मीरी कश्मीर पर अपना प्रेजेंटेशन दे रहा था, टॉपिक था कश्मीर की स्वतन्त्रता.! दुर्भाग्य से सभी मूकदर्शक बने सुन रहे थे। जैसे ही उसका प्रेजेंटेशन समाप्त हुआ मैं सीधे खड़े हो गया और उसके एक एक दावे व आंकड़े की खाल खींचने के बाद मैंने अपना प्रश्न दागा कि काऊ कहता है कि कश्मीर की आजादी कोई मुद्दा रहा है.? उसने पूंछा मतलब...?? मैंने कहा कश्मीर की आजादी केवल आतंकवाद और पत्थरवाजी को हक की लड़ाई के रूप में स्थापित करने का एक प्रोपेगंडा मात्र है। कश्मीर में यदि आज़ादी का प्रश्न है तो अलगाववादियों के गिलानी जैसे नेता कश्मीर के पाकिस्तान का हिस्सा होने का नारा क्यों लगते हैं.? इसके बाद भी ये तथाकथित रूप से आज़ादी के लिए लड़ने वाले कश्मीरियों के एकमात्र घोषित नेता कैसे और क्यों बने रहते हैं जिनके कहने पर पूरा कश्मीर हिंसक बंद की ओर महीने में 3-3 बार चला जाता है?? थोड़ी देर तक तो उन्होने इधर उधर के सारे ज्ञान के सहारे अपनी बात बचाने का प्रयास किया लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया कि आज भी कश्मीर में आजादी की अपेक्षा आज भी पाकिस्तान के चाहने वाले अधिक हैं। लगभग वैसे ही तर्कों के सहारे ये बुद्धिजीवी भी जीते हैं जिनका आपने अपने लेख में भंडा फोड़ा है।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: dr. tarun dr. tarun

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

डाक्टर भूपेन्द्र जी,शालीन वस्त्रविन्यास का मैंने सदा समर्थन किया है,अमर्यादित व्यवहार की समर्थक मैं कभी नहीं रही परन्तु नारी देह शोषण का शिकार तब भी रही जब ये परिस्थितियाँ नहीं थी,हाँ घटनाएँ प्रकाश में कम आती थी.अतः एक मात्र यही कारण है यह नहीं माना जा सकता आज ही पढ़ा ११ वर्ष की एक बच्ची लगभग ६ माह से किसी दरिंदगी के कारण जयपुर में अस्पताल में १२ आपरेशन होने के पश्चात भी अभी वो जीवन-मृत्यु के मध्य संघर्ष कर रही है.इसी प्रकार अबोध बच्चियां घर में भी शिकार बनती हैं ऐसे केसेज परिचित के परिवार में भी घटित हुए अतः विकृत मानसिकता में सुधार के लिए भी प्रयास रत रहना आवश्यक है.और सबसे अधिक आवश्यकता है इन सबकी जड़ शराब को प्रतिबंधित करने की.अधिकांश मामले के पीछे नशा कारण किसी न किसी रूप में रहता है

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आदरणीय भूपेन्द्र जी , नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ज्वलंत प्रश्न पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए धन्यवाद क्यूंकि आज कल जो शोर है उसमे अपनी राय रख दी आपने ,यही प्रशंसा का कार्य है! यदि स्त्री केवल शरीर नहीं तो उसे क्यों ढकना और क्यों दिखाना? मैं जरा व्याकुल हूँ ,ऊपर वाले आपके प्रश्न का उत्तर आपके ही लेख में ढूँढने की बहुत कोशिश की पर जान ना पाया ............ जब भी ऐसे व्यभिचार सामने आते हैं (सामने इसीलिए कह रहा हूँ क्यूंकि होते तो बहुत हैं पर सामने नगण्य ही आ पाते हैं) तभी ये कपड़ो की लम्बाई का प्रश्न सामने क्यूँ आता है ...? बल्कि प्रश्न ये है की ये प्रश्न आता ही क्यूँ है और माफ़ कीजिये इसका उत्तर भी आपका प्रश्न ही है, की जब स्त्री केवल शरीर नहीं तो उसे क्यों ढकना और क्यों दिखाना? क्यों ढकना और क्यूँ दिखाना आपस में १ दुसरे को बता देते हैं की न ढकने का औचित्य है न दिखाने का , ये प्रश्न विरोधाभाषी है और प्रश्न का मूल समाप्त हो जाता है........ इससे गहरे प्रश्न भी है सोचने के लिए और वो हैं .... १.क्या मानसिकता बदलेंगे हम अपनी और समाज की ? २.हमारे दिए संस्कारों में क्या कमी रह गयी आखिर या शायद वो संस्कार भी किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात पूर्ण हैं ? ३.पि टी उषा, कल्पना चावला ,सानिया मिर्ज़ा , इंदिरा गाँधी जैसे व्यक्तित्व क्या दे पायेगा ये समाज या या स्त्रियों के कपड़ो की लम्बाईया मापता फिरेगा ४, और अंत में, क्या पंछियों को अधिकार दे पाएंगे हम, कि जो आकाश बनाया है हमने उसमें उन्हें भी उन्मुक्त उड़ने का उतना ही अधिकार है जितना हमारा! धन्यवाद

के द्वारा: ujjawal pandey ujjawal pandey

विज्ञान ने भी आर्य-द्रविड़ के भेद को नकारा........ सदियों से भारतीय इतिहास पर छायी आर्य आक्रमण सम्बन्धी झूठ की चादर को विज्ञान की खोज ने एक झटके में ही तार-तार कर दिया है। विज्ञान की आंखों ने जो देखा है उसके अनुसार तो सच यह है कि आर्य आक्रमण नाम की चीज न तो भारतीय इतिहास के किसी कालखण्ड में घटित हुई और ना ही आर्य तथा द्रविड़ नामक दो पृथक मानव नस्लों का अस्तित्व ही कभी धरती पर रहा है। इतिहास और विज्ञान के मेल के आधार पर हुआ यह क्रांतिकारी जैव-रासायनिक डीनएनए गुणसूत्र आधारित अनुसंधान फिनलैण्ड के तारतू विश्वविद्यालय, एस्टोनिया में हाल ही में सम्पन्न हुआ है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉं. कीवीसील्ड के निर्देशन में एस्टोनिया स्थित एस्टोनियन बायोसेंटर, तारतू विश्वविद्यालय के शोधछात्र ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने अनुसंधान में यह सिध्द किया है कि सारे भारतवासी जीन अर्थात गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संतानें हैं, आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है, और तो और जो अनुवांशिक गुणसूत्र भारतवासियों में पाए जाते हैं वे डीएनए गुणसूत्र दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं पाए गए। शोधकार्य में अखण्ड भारत अर्थात वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल की जनसंख्या में विद्यमान लगभग सभी जातियों, उपजातियों, जनजातियों के लगभग 13000 नमूनों के परीक्षण-परिणामों का इस्तेमाल किया गया। इनके नमूनों के परीक्षण से प्राप्त परिणामों की तुलना मध्य एशिया, यूरोप और चीन-जापान आदि देशों में रहने वाली मानव नस्लों के गुणसूत्रों से की गई। इस तुलना में पाया गया कि सभी भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाले हैं, 99 प्रतिशत समान पूर्वजों की संतानें हैं। भारतीयों के पूर्वजों का डीएन गुणसूत्र यूरोप, मध्य एशिया और चीन-जापान आदि देशों की नस्लों से बिल्कुल अलग है और इस अन्तर को स्पष्ट पहचाना जा सकता है । जेनेटिक हिस्ट्री ऑफ साउथ एशिया...... ज्ञानेश्वर चौबे को जिस बिन्दु पर शोध के लिए पीएच.डी. उपाधि स्वीकृत की गई है उसका शीर्षक है- 'डेमॉग्राफिक हिस्ट्री ऑफ साउथ एशिया: द प्रिवेलिंग जेनेटिक कांटिनिटी फ्रॉम प्रीहिस्टोरिक टाइम्स' अर्थात 'दक्षिण एशिया का जनसांख्यिक इतिहास: पूर्वऐतिहासिक काल से लेकर अब तक की अनुवांशिकी निरंतरता'। संपूर्ण शोध की उपकल्पना ज्ञानेश्वर के मन में उस समय जागी जब वह हैदराबाद स्थित 'सेन्टर फॉर सेल्यूलर एंड मोलेक्यूलर बायोलॉजी' अर्थात सीसीएमबी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के ख्यातलब्ध भारतीय जैव वैज्ञानिक डॉ. लालजी सिंह और डॉ के. थंगराज के अन्तर्गत परास्नातक बाद की एक शोधपरियोजना में जुटे थे। ज्ञानेश्वर के मन में विचार आया कि जब डीएनए जांच के द्वारा किसी बच्चे के माता-पिता के बारे में सच्चाई का पता लगाया जा सकता है तो फिर भारतीय सभ्यता के पूर्वज कौन थे, इसका भी ठीक-ठीक पता लगाया जा सकता है। बस फिर क्या था, उनके मन में इस शोधकार्य को कर डालने की जिद पैदा हो गई। ज्ञानेश्वर बताते हैं-बचपन से मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि हमारे पूर्वज कौन थे? बचपन में जो पाठ पढे़, उससे तो भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी कि क्या हम आक्रमणकारियों की संतान हैं? दूसरे एक मानवोचित उत्सुकता भी रही। आखिर प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी तो यह जानने की उत्सुकता पैदा होती ही है कि उसके परदादा-परदादी कौन थे, कहां से आए थे,उनका मूलस्थान कहां है और इतिहास के बीते हजारों वर्षों में उनके पुरखों ने प्रकृति की मार कैसे सही, कैसे उनका अस्तित्व अब तक बना रहा है? ज्ञानेश्वर के अनुसार, पिछले एक दशक में मानव जेनेटिक्स और जीनोमिक्स के अध्ययन में जो प्रगति हुई है उससे यह संभव हो गया है कि हम इस बात का पता लगा लें कि मानव जाति में किसी विशेष नस्ल का उद्भव कहां हुआ, वह उद्विकास प्रक्रिया में दुनिया के किन-किन स्थानों से गुजरी, कहां-कहां रही और उनके मूल पुरखे कौन रहे हैं? उनके अनुसार- माता और पिता दोनों के डीएनए में ही उनके पुरखों का इतिहास भी समाया हुआ रहता है। हम जितनी गहराई से उनके डीएनए संरचना का अध्ययन करेंगे, हम यह पता कर लेंगे कि उनके मूल जनक कौन थे? और तो और इसके द्वारा पचासों हजार साल पुराना अपने पुरखों का इतिहास भी खोजा जा सकता है। कैंब्रिज के डॉ. कीवीसील्ड ने किया शोध निर्देशन........ हैदराबाद की प्रयोगशाला में शोध करते समय उनका संपर्क दुनिया के महान जैव वैज्ञानिक प्रोफेसर कीवीसील्ड के साथ आया। प्रो. कीवीसील्ड संसार में मानव नस्लों की वैज्ञानिक ऐतिहासिकता और उनकी बसावट पर कार्य करने वाले उच्चकोटि के वैज्ञानिक माने जाते हैं। इस नई सदी के प्रारंभ में ही प्रोफेसर कीवीसील्ड ने अपने अध्ययन में पाया था कि दक्षिण एशिया की जनसांख्यिक संरचना अपने जातीय एवं जनजातीय स्वरूप में न केवल विशिष्ट है वरन् वह शेष दुनिया से स्पष्टत: भिन्न है। संप्रति प्रोफेसर डॉ. कीवीसील्ड कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बायोसेंटर का निर्देशन कर रहे हैं। प्रोफेसर डॉ. कीवीसील्ड की प्रेरणा से ज्ञानेश्वर चौबे ने एस्टोनियन बायोसेंटर में सन् 2005 में अपना शोधकार्य प्रारंभ किया। और देखते ही देखते जीवविज्ञान सम्बंधी अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध जर्नल्स में उनके दर्जनों से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हो गए। इसमें से अनेक शोध पत्र जहां उन्होंने अपने गुरूदेव प्रोफेसर कीवीसील्ड के साथ लिखे वहीं कई अन्य शोधपत्र अपने उन साथी वैज्ञानिकों के साथ संयुक्त रूप से लिखे जो इसी विषय से मिलते-जुलते अन्य मुद्दों पर काम कर रहे हैं। अपने अनुसंधान के द्वारा ज्ञानेश्वर ने इसके पूर्व हुए उन शोधकार्यों को भी गलत सिद्ध किया है जिनमें यह कहा गया है कि आर्य और द्रविड़ दो भिन्न मानव नस्लें हैं और आर्य दक्षिण एशिया अर्थात् भारत में कहीं बाहर से आए। उनके अनुसार, 'पूर्व के शोधकार्यों में एक तो बहुत ही सीमित मात्रा में नमूने लिए गए थे, दूसरे उन नमूनों की कोशिकीय संरचना और जीनोम इतिहास का अध्ययन 'लो-रीजोलूशन' अर्थात न्यून-आवर्धन पर किया गया। इसके विपरीत हमने अपने अध्ययन में व्यापक मात्रा में नमूनों का प्रयोग किया और 'हाई-रीजोलूशन' अर्थात उच्च आवर्धन पर उन नमूनों पर प्रयोगशाला में परीक्षण किया तो हमें भिन्न परिणाम प्राप्त हुए।' माइटोकांड्रियल डीएनए में छुपा है पुरखों का इतिहास....... ज्ञानेश्वर द्वारा किए गए शोध में माइटोकांड्रियल डीएनए और वाई क्रोमासोम्स और उनसे जुड़े हेप्लोग्रुप के गहन अध्ययन द्वारा सारे निष्कर्ष प्राप्त किए गए हैं। उल्लेखनीय है कि माइटोकांड्रिया मानव की प्रत्येक कोशिका में पाया जाता है। जीन अर्थात मानव गुणसूत्र के निर्माण में भी इसकी प्रमुख भूमिका रहती है। प्रत्येक मानव जीन अर्थात गुणसूत्र के दो हिस्से रहते हैं। पहला न्यूक्लियर जीनोम और दूसरा माइटोकांड्रियल जीनोम। माइटोकांड्रियल जीनोम गुणसूत्र का वह तत्व है जो किसी कालखण्ड में किसी मानव नस्ल में होने वाले उत्परिवर्तन को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है और वह इस उत्परिर्तन को आने वाली पीढ़ियों में सुरक्षित भी रखता है। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि माइटोकांड्रियल डीएनए वह तत्व है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक माता के पक्ष की सूचनाएं अपने साथ हूबहू स्थानांतरित करता है। यहां यह समझना जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति की प्रत्येक कोशिका में उसकी माता और उनसे जुड़ी पूर्व की हजारों पीढ़ियों के माइटोकांड्रियल डीएनए सुरक्षित रहते हैं। इसी प्रकार वाई क्रोमोसोम्स पिता से जुड़ी सूचना को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित करते हैं। वाई क्रोमोसोम्स प्रत्येक कोशिका के केंद्र में रहता है और किसी भी व्यक्ति में उसके पूर्व के सभी पुरूष पूर्वजों के वाई क्रोमोसोम्स सुरक्षित रहते हैं। इतिहास के किसी मोड़ पर किसी व्यक्ति की नस्ल में कब और किस पीढ़ी में उत्परिवर्तन हुआ, इस बात का पता प्रत्येक व्यक्ति की कोशिका में स्थित वाई क्रोमोसोम्स और माइटोकांड्रियल डीएनए के अध्ययन से आसानी से लगाया जा सकता है। यह बात किसी समूह और समुदाय के संदर्भ में भी लागू होती है। एक वंशवृक्ष से जुड़े हैं सभी भारतीय........ ज्ञानेश्वर ने अपने अनुसंधान को दक्षिण एशिया में रहने वाले विभिन्न धर्मों-जातियों की जनसांख्यिकी संरचना पर केंद्रित किया। शोध में पाया गया है कि तमिलनाडु की सभी जातियों-जनजातियों, केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश जिन्हें पूर्व में कथित द्रविड़ नस्ल से प्रभावित माना गया है, की समस्त जातियों के डीनएन गुणसूत्र तथा उत्तर भारतीय जातियों-जनजातियों के डीएनए का उत्पत्ति-आधार गुणसूत्र एकसमान है। उत्तर भारत में पाये जाने वाले कोल, कंजर, दुसाध, धरकार, चमार, थारू, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के डीएनए का मूल स्रोत दक्षिण भारत में पाई जाने वाली जातियों के मूल स्रोत से कहीं से भी अलग नहीं हैं। इसी के साथ जो गुणसूत्र उपरोक्त जातियों में पाए गए हैं वहीं गुणसूत्र मकरानी, सिंधी, बलोच, पठान, ब्राहुई, बुरूषो और हजारा आदि पाकिस्तान में पाये जाने वाले समूहों के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अत्यंत प्रासंगिक, अत्यंत आवश्यक, शोधपूर्ण पठनीय आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ ! "हाफीज़ सईद ही मुंबई २६-११ का मुख्य आरोपी है इसीको और इसके गुर्गो को बचाने के लिए माओवादी आन्दोलन स्तर पर जुटे है.अब ध्यान देने वाली बात ये है की भारत में माओवादी भगत सिंह का बहुत दुरुपयोग कर रहे है वो अपने हर कार्यक्रम में भगत सिंह की फोटो लगते है. उनके भाषण को लोगो के बिच प्रसंग इत्यादि से हटाकर अपने अनुसार फैलाते है पर इन्ही का मित्र भगत सिंह के नाम पर एक जगह का नाम नहीं रखने दिया और उसे इतना बुरा लगा की उसने हिंसा शुरू करने की धमकी दी. लेकिन अब तक कम्यूनिस्टो की तरफ से विरोध का एक स्वर नहीं उभरा. कारण स्पष्ट है की ये माओवादी कम्युनिस्ट भगत सिंह का केवल इस्तेमाल कर रहे है और इनके असली यार और हथियार तो ये आतंकी है."

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

आदरणीय डाक्टर साहब, सादर ! प्रश्न तो बहुत से हैं, इतने की जवाब देते-देते ये जीवन के अंतिम पडाव पर पहुँच जायेंगे और फिर भी कुछ प्रश्न बाकी ही रह जायेंगे ! पर जनता के बहुत से प्रश्नों की आवाज नहीं होती ! वे फिजा में तैरते रहते हैं, अदृश्य रूप में ! कहते हैं की जनता की आवाज और भगवान् की लाठी बेआवाज होती है ! साँय से जब सिर पर गिरती है , तब पता चलता है ! छुपने की जगह भी नहीं रहती ! परिस्थितियाँ पलक झपकते करवट बदल लेती हैं, कब अनुकूल और कब प्रतिकूल हो जाती हैं, समझ में नहीं आता ! कांग्रेस उस रोगी की तरह हो गया है, जो अंतिम अवस्था आने पर अपने भले-बुरे का ज्ञान खो देता है, और आँय-बाँय-साँय बकने लगता है ! धन्यवाद !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

श्री अशोक जी , मै केवल तुलना इसलिए नहीं कर रहा हु की आप का क्या विचार है नारीयो के मामले में ,बल्कि मेरे इस अध्ययन का दो कारण है ,वो यह है की १- इस विषय पर अब तक क्रम वार किसी ने अध्ययन किया नहीं है ,अतः मुझे यह शोध का विषय लगा २ - कुछ तथाकथित नारी विचारक सारा दोष हमारी पुस्तकों पर डाल देते है जो की हमारे ऋषियों ने लिखा.. और आपने जो बात कही की नारी खुद अपने इस स्थिति के लिए जिम्मेवार है , उस पर मेरा ये मत है की नारी को आखिर ये माहौल कहा से मिल गया की वो खराब स्थिति में पहुच जाय .. ये हमारे संस्कारो में गिरावट और संस्कृति में मिलावट का परिणाम है आप जल्दी से पूर्णतया स्वस्थ्य हो जाय . ऐसी मेरी कामना है..

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

आदरणीय भूपेंदर जी                            सादर, महिलाओं कि आज कि और प्राचीन युग स्थिति कि तुलना करने को मै बहुत जायज नहीं मानता. उस काल में मनोरंजन के क्या साधन थे और आज क्या उपलब्ध हैं.फिरभी तब भी समाज में नारी का सम्मान था और आज भी है यह बात अलग है कि आज कि परिस्थिति में नारी स्वयं भी अपने पतन में शामिल है.                          आलेख बहुत ही अधिक तथ्यात्मक बनाने में काफी लंबा और उबाऊ हो गया है यदि इसे पुस्तक से लिए शब्दों कि जगह अपनी भाषा में परिवर्तित करके लिखा जाता तो कुछ लम्बाई अवश्य ही कम होती. फिर भी आपके एक अच्छे प्रयास के लिये आप बधाई के पात्र हैं.                         क्षमा करें कुछ दिनों से अस्वस्थता के कारण मंच से दूर ही था कुछ दिनों से फिर सक्रीय होने के लिए प्रयासरत हूँ. 

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय! सादर नमस्कार, पिछली बार की तरह एक बार फिर आपने बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किया है. अच्छी और महत्वपूर्ण जानकारी. एक बात और जैसा की मैंने आपके पिछले लेख में भी कहा था कि यह एक रोचक आलेख है, और श्री मान "जी सिंह" जी ने भी कहा है कि लम्बाई की चिंता न करें, गागर में सागर. ...... आपको बताना चाहता हूँ कि आपका आलेख इतना रोचक रहता है कि मैं इसे पूरे ध्यान से पढता हूँ और सेव करके रखता हूँ ताकि भविष्य में भी पढ़ सकूँ. अब मेरे पढ़ने से क्या होता है ? मैं जब ५,६ में था तब इतिहास से बहुत भागता था, सभी अध्यापक जो मेरे प्रशंसक थे वो इतिहास पर आकर दुखित हूँ जाते कि आशीष इतिहास नहीं पढता. फिर जब थोडा बड़ा हुआ तो इतिहास की आवश्यकता महसूस हुई, परन्तु PCM के कारण समय नहीं दे पाता, कभी अगर समय मिलता तो फिर वही पुरानी समस्या मुझे इतिहास बोरिंग विषय लगता लेकिन इस मंच से जुड़ने के बाद कई लोगो के आलेख पढकर रोचकता का पता चला, और फिर जब आपका पहला आलेख पढ़ा तो मानो इतिहास और रोचक मेरे लिए एक दूसरे के पर्यायवाची हो गए. अब इतने से अपने लेख की रोचकता का अंदाजा लगा लीजिए. आपके अगले आलेखों का इतजार रहेगा. आपका भाई सामान मित्र आशीष

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

नमस्कार भूपिंदर भाई ! आपको बधाई हो सुंदर , अति सुंदर ! पर मुझे कुछ कहेना है की , आपने लिखा है की आज हमारे देश की राजधानी को ”रेप सिटी ऑफ़ द वर्ल्ड ” के नाम से नवाज दिया गया. बच्चियों को उनके मांओ कोख में मार दिया जा रहा है. उनको अपने झूठे प्रेम जाल में फसाकर उनके शरीर का शोषण करना तथाकथित पढ़े लिखे नौजवानों का मुख्य कार्य बनता जा रहा है , कोई भी विज्ञापन उनके शरीर से बिना कपड़े पूरी तरह से हटाये पूरा नहीं हो पा रहा है , अपने आफिस में सुन्दर लडकियों को रखना स्टेटस बन गया.पर एन सब कर्मो में नारी का कही न कही दोष तो है | बलात्कारी भी किसे के पुत्र होता है सस्करवान बनाना माता का काम है | अपराधी अपने परिवार के अवगुणों से बनते है जो उनके भविष्ये को बनाते है | माँ की कोख में लड़की है उसको मरने की लिए भी एक नारी ही होती है रिश्ते मै माँ हो या सास या महिला डोक्टर | इसी तरह विज्ञापन में कोई जोर या जबरदस्ती से काम नही करता ? आप एक जूठा ही सही फिल्म /टीवी के कलाकार / मोडल बनने का विज्ञापन दे दो ! फिर देखो ! भारत मै नारी की आजादी ! और हा नोकरी का लालच तो बस.................. घर परिवार बच्चे सब को ख़तम कर सकता है | नोकरी के लिए जूते पर है परिवार औरत के लिए ! किर्पया मेरी कहानिया आजाद लड़की पड़े !

के द्वारा: aman kumar aman kumar

भूपेन्द्र जी आपने अपने लेख के द्वारा प्रचीन काल में नारी का समाज में क्या स्थान था इस पर विस्तृत शोध किया व हम सब को इस से अवगत कराया। इस मह्त्वपूर्ण विषय पर पूर्ण प्रमाणों सहित जानकारी देने तथा अति सुंदर लेख के लिए आपका बहुत धन्यवाद। आपने सही लिखा है कि आक्रमणकारियों की नज़र से हम एक स्त्री को भोग्या की दृष्टि से देखने लग गए। शायद हम व हमारा समाज भी उतना ही दोषी है जितना कि आक्रमणकारी। आज भी जब नवयुवतियों व युवकों को पाश्चात्य सभ्यता का अन्धाधुंद अनुकरण करते, न्यूनतम परिधान में लिपटे अपने को अत्याधिक आधुनिक समझने वालों की सोच देखकर अत्यंत दुख होता है। काश हम उनकी ईमानदारी, सच्चाई, श्रम, लगन, स्वच्छता, जरूरतमंदों की मदद आदि अच्छे गुणों को अपनाते जो हमारी सभ्यता में, हमारे संस्कारों में समाहित हैं। एक बार फिर सुंदर लेख के लिए बधाई व धन्यवाद।

के द्वारा: psudharao psudharao

आदरणीय डॉ .साहब .सादर नमस्कार विस्तृत शोध और परिश्रम से आपने यह पोस्ट तैयार की है ,…स्पष्ट है की आपने ये लेख के लिए पूरी म्हणत और आंकड़े जुटाए हैं ! आपका शत शत अभिनन्दन ,..काश दिखावटी नारीवादिओं का दिमाग खुले ,..अर्धनारीश्वर की संकल्पना भारतीय संस्कृति का अद्भुत उदाहरण है ,हमारे यहाँ नारी सदैव पूजित और पूज्यनीय रही है लेकिन विदेशी आक्रमणों से हमारा पतन होता गया ,..आतंरिक जयचंद भी इसके जिम्मेदार हैं ,…बहुत अच्छा लगा यह जानकर कि ताड़ना शब्द पर आपके और मेरे विचार बिलकुल मेल खाते हैं ,..अत्यंत उच्चकोटि के शोधपरक लेख के लिए पुनः अभिनन्दन ..सादर ! बहुत कुछ भ्रम को दूर करता है आपका ये लेखन ! एक निवेदन- अगर आप इस लेख को दो खण्डों में लाते तो और भी बेहतर होता

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

भूपेन्द्र जी, एक श्रमपरक व शोधपरक लेख के लिए हार्दिक साधुवाद! आशा है आपका यह लेख उन तमाम लोगों की शंकाओं का व आरोपों का एक सीमा तक उत्तर देने में समर्थ होगा| जहाँ तक मेरा मत है मैं लेख में आपके प्रयास की सराहना करता हूँ, साथ ही, जैसा कि मैंने पहले आपसे इस विषय पर चर्चा में भी कहा था, कुछ विषयों पर और अधिक शोध की आवशयकता अनुभव करता हूँ| मैं सभी लेखकों के के शोधकार्य को आवश्यक महत्व देता हूँ किन्तु विश्वास मूल ग्रंथों के अपने अध्ययन पर ही करता हूँ| 12th तक मैं घर में ही था, उस समय मुझे हमारे धर्मग्रंथों के गहन अध्ययन का अच्छा समय मिलता था, ग्रेजुएशन से समस्त ग्रंथागार घर में ही छूट गया और ध्यान दूसरी जगह लग गया! किन्तु आशा करता हूँ कि पुराने संकल्प पुनः गतिशील होंगे! आप जैसे समर्पणवान लोगों को देखकर नई ऊर्जा मिलती है! शोध पर मैंने इसलिए विशेष बल दिया क्योंकि लेख के कुछ बिन्दुओं पर किन्हीं विद्वानों के मत के बाद भी मुझे आगे जाने की आवश्यकता लगती है, या यूं कहें कि अभी पूर्ण सहमति नहीं है! किन्तु उनसे लेख की मूल भाव अथवा प्रभाव शक्ति पर बहुत अंतर नहीं पड़ता..!! पुनः इतने विस्तृत लेख के लिए हार्दिक साधुवाद!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीय रविन्द्र जी वैचारिक विरोध हो सकता है इसमें मान अपमान का प्रश्न ही नहीं उठता, जिस योजना को मैंने रखा वो प्रथम द्रष्टाया धोखा ही लगती है क्योंकि हमें समस्या का निवारण नहीं सोचना है बल्कि बनाए रखना है, डोक्टर साहब आप भी ध्यान दें............, भारत सरकार और राज्य सरकारों का का शिक्षा के ऊपर किया गया कुल सालाना खर्चा ३५०००० करोड़ से ज्यादा है इसमें सरकार का वो बजट शामिल नहीं है जो वो शिक्षा के प्रचार प्रसार प्रौढ़ शिक्षा और अन्य प्रकार की योजनाओं में खर्च करती है यानी अगर सरकार की कुछ आलतू फ़ालतू योजनाओं को जोड़ लिया जाए तो ये राशि ४००००० करोड़ से ज्यादा हो जायेगी, जिस राशि के द्वारा लगभग १० वर्ष में वो परिवर्तन लाया जा सकता है जिसे आप धोखा समझ रहे हैं, जब हम ६० साल तक आरक्षण देकर समाज को बाँट सकते हैं तो क्या दस साल में उसे सुधार नहीं सकते सिर्फ इच्छा शक्ति की ज़रुरत है, आदरणीय रविन्द्र जी मैं ग्रामीण परिवेश से ही हूँ और मेरे घर में मेरे चाचाजी आज भी खेती ही करते हैं, और आश्चर्य जनक तथ्य ये है की मेरे गाँव में सबसे ज्यादा दलित ही हैं और उनके पास ज़मीने भी वैश्य और ठाकुर जो की हमारे गाँव में अन्य जातियां हैं उनसे ज्यादा हैं, लेकिन फिर भी आर्थिक स्थिति उनकी अच्छी नहीं है, कारण क्योंकि वो खाली समय में बैठकर गप्पें हांकते हैं, और लड़ाई झगडा करते हैं हाथ में आये पैसों को खा पीकर उड़ा देते हैं, उनकी स्थिति और आदत देखकर अनायास ही मुझे मुंशी प्रेमचंद की कहानी " कफ़न " याद आ जाती है शायद उन्होंने वो कहानी मेरे ही गाँव में आकर लिखी हो, बहरहाल ...... ! क्या आप ये बता सकते हैं की समाज में सामाजिक तौर पर आरक्षण से क्या परिवर्तन आया है आर्थिक परिवर्तन की बात नहीं कर रहा हूँ ..........! आरक्षण जिसको आप अधिकार कह कर जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं वास्तव में वो सामाजिक समरसता में बोया जा रहा ज़हर है मैं ये नहीं कह रहा की सवर्णों ने दलितों पर अत्याचार नहीं किये, परन्तु क्या इसका इलाज़ सवर्णों पर अत्याचार करना है तो फिर भूल जाइए की समाज मैं कभी समरसता आ पाएगी, क्योंकि जब सवर्णों को मौका मिलेगा तो वो अपने मन की करेंगे ........ ! तो क्या इंसानी समाज जंगल बन कर रह जाएगा, जब हिंसा का समाधान हिंसा नहीं है तो फिर यहाँ अत्याचार का समाधान अत्याचार कैसे हो गया........! आरक्षण वास्तव में, दलितों को नकारा बनाने का तरीका है जिसे वो अधिकार समझने लगे हैं क्योंकि मुफ्त में मिला सामान और सम्मान कभी नहीं फलता वो विद्वेष का कारण ही बनता है

के द्वारा: munish munish

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

आदरणीय डॉ. भूपेंद्र जी आपने उपरोक्त लेख में बिलकुल सही सुझाया है आदर्श आरक्षण के विषय में,मै आपसे बिलकुल सहमत हूँ| बिलकुल आरक्षण सिर्फ उनको ही दें जिनको इसकी वास्तविक आवश्यकता है| परन्तु में महोदय मुनीश जी द्वारा आरक्षण के विषय में की गयी टिपण्णी से असहमत हूँ, आरक्षण आप खून के आंसू पीकर दे चाहे जैसे दें आप कोई एहसान नहीं कर रहे हैं अपितु ३००० हज़ार सालों से सवर्णों द्वारा खोदी गयी खाई की भरपाई एवं भुगतान कर रहे हैं| आरक्षण के द्वारा न तो इंजिनीरिंग का स्तर गिरा है न ही अन्य क्षेत्रो में|मुनीश जी ने १ उदहारण दिया सवर्ण topper छात्र का और ४५% ग्रेस वाले छात्र का| मै भी १ उदहारण देता हूँ उप बोर्ड १२वी का ५६% लाने वाला दलित छात्र आई आई टी प्रवेश परीक्षा में ऐ.आई.आर ८५ प्राप्त करता है,वह बताता है की उप बोर्ड में ५६% लाने का कारण उसके शिक्षको द्वारा उसे प्रताड़ित करना था और यह कहना था की तुम्हे पढने की क्या जरुरत है तुम्हारे पास तो पहले से ही खैरात है|उच्च शिक्षण संस्थानों में भी आरक्षण के बाद भी प्रवेश ८० ८५ प्रतिशत अंक आने पर ही मिलता है| आज 15% की आबादी पर 50 % सीट्स जनरल को मिलती है फिर भी 85% शोषित आबादी के 50 % हक़ पर जलते हैं|

के द्वारा: rajanbheem1 rajanbheem1

मुनीश जी, सादर नमस्कार. आप एक ऐसी व्यवस्था का सपना देख रहें हैं जो धोखा है और कुछ नहीं. सब बच्चों के लिए बोर्डिंग की व्यवस्था, बच्चे के नाम के आगे जाति का उल्लेख न करना, सब को समान शिक्षा , भारतीय समाज में ये सब एक धोखा है. जिस समाज में देवताओं को, देशभक्तों को, जाति के आधार पर बाँट लिया हो, जहाँ जाति के नाम पर अपने ही खून को सड़क पर बहा दिया जाता हो, जहाँ शिक्षण संस्थानों, और धर्मशालाओं के नाम तक जाति के आधार पर रखे जाते हों वहां उपरोक्त व्यवस्था एक सपना है. मुनीश जी , शायद आप भारत के ग्रामीण परिवेश से परिचित नहीं हैं. दलित लोगों को कदम-कदम पर घिसी-पिटी, सड़ती, जाति आधारित व्यवस्था का शिकार होना पड़ता है. मुझे ज्यादा लिखने की जरुरत नहीं हैं. आप पिछड़ों को आरक्षण न दो ठीक है, क्योंकि उन्हें अछूत व्यवस्था और जलालत का सामना नहीं करना पड़ता. लेकिन दलितों के लिए आरक्षण उनका अधिकार है , इसके लिए उन्हें किसी के त्याग की जरुरत नहीं हैं. हाँ आरक्षण की एक सीमा जरुर निर्धारित करना बहुत जरुरी है. मैं १ नम्बर पर प्रवेश का समर्थन नहीं करता. लेकिन आज दलितों के जीवन में जो सुधार दिखाई देता है उसके लिए, धन्यवाद् आरक्षण कहना चाहिए. मुनीश जी, मेरा उद्देश्य आपका विरोध करना नहीं हैं. मैंने केवल अपने विचार रखें हैं. फिर भी यदि आप को बुरा लगा हो तो मैं क्षमा चाहूँगा. आपके लिए शुभकामनाएं. नमस्ते जी.

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

डॉ. भूपेंद्र जी, नमस्कार! मुझे भी बहुत ग्लानि हो रही है कि सत्य हरिश्चंद्र नाटक की पूरी किताब मैंने बार बार पढी है. उसपर अभिनय हमारे गाँव में लक्ष्मी पूजा के समय बार बार किया जाता था, मैं उसमे सक्रिय सहयोग भी करता था. पर जितनी जानकारी आज आपने उपलब्ध कराई मुझे नहीं थी. नुझे भी उनका जन्म दिन याद नहीं था. आपके द्वारा प्रस्तुत भारतेंदु जी की पंक्ति का समर्थन करता हूँ. ” निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल । बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।। विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार। सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।।” एक पंक्ति और जोड़ रहा हूँ जो सत्य हरिश्चंद्र नाटक की है पर आज भी सत्य है टूट टाट घर टपकत खटियो टूट, प्रिय की बांह उसीसवां सुख की लूट! (आपको अर्थ बताने की जरूरत तो है नहीं) सादर साभार !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

प्रिय डॉक्टर साहब, बहुत मेहनत से लिखा गया लेख जिसके लिए आपको बधाई, मेरे विचार में जब आपने प्रयोगात्मक तरीके से लेने को कहा है तो में प्रयोग को बदलने की कोशिश करता हूँ, सभी शिक्षण संस्थानों सरकारी - गैरसरकारी को सरकार का संरक्षण मिले और सभी में बोर्डिंग की व्यवस्था हो, जिसका खर्चा अपने उलटे सीधे मिड डे मील टाइप की योजनाओं को बंद करके पूरा बड़े आराम से कर सकती है, या कैसे भी उसको इसकी पूर्ती करनी चाहिए क्योंकि ये सबसे महत्वपूर्ण है, बच्चे शिक्षण संस्थाओं में ही रहें, उनके नाम के साथ जाती सूचक शब्द शुरू से ही न लगाया जाए, सबको सामान शिक्षा समान रूप से मुफ्त मिले. उसके बाद उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें जॉब मिले आरक्षण की जरूरत ही कहाँ रह जाती है ..................! आपने बहुत से उदाहरण दिए, जो आरक्षण के ज़रिये आर्थिक असमानता तो दूर करने की बात करते हैं लेकिन सामाजिक नहीं और वो आरक्षण के रहते किसी भी कीमत पर संभव नहीं है. मेरा एक दोस्त है, स्वर्ण जाती का है उसने हाई स्कूल में जिले में टॉप किया इंटर में भी टॉप किया साथ ही उसका नंबर रूडकी इन्जीनीरिंग और उस एम् एल एन आर में आया परन्तु उसे उस समय सेना जाने का भूत सवार हो गया इसलिए वो इंजीनियरिंग में नहीं गया और सेना में उसे एस एस बी क्लीयर नहीं हुआ ......... अब उसने बी एड करके स्कूल में टीचर बनने की सोची लेकिन वो टीचर भी न बन सका क्योंकि इस बार आरक्षण आड़े आ गया, दुःख का विषय ये नहीं है की वो टीचर नहीं बन पाया, दुःख का विषय ये है की जिसको वो नौकरी मिली वो भी हमारे साथ पढ़ा हुआ ही एक लड़का था जिसके कभी भी ४५% प्रतिशत से ज्यादा नंबर नहीं आये ग्रेस मिला वो अलग, आर्थिक स्थिति भी उसकी अच्छी थी, वो टीचर बन गया तो वो आने वाली जनरेशन को क्या पढ़ायेगा जिसे स्वयं ही ठीक से नहीं आता, सिर्फ आरक्षण के कारण वो हज़ारों बच्चों का भविष्य बिगाड़ देगा.........! शायद इसी वजह से ये बात निकल कर सामने आई है की भारतीय इंजिनियर की क्वालिटी गिरी है, और ये हर क्षेत्र में है, अब क्वालिटी नहीं है, में ये नहीं कह रहा की दलितों में क्वालिटी नहीं है लेकिन जिन में नहीं है उन्हें तो ज़बरदस्ती इंजिनियर मत बनाओ .......... १ नुम्बर वालों को डॉक्टर मत बनाओ ........... इस से स्पष्ट नुक्सान हैं पहला तो हम किसी भी स्तर पर क्वालिटी मेन्टेन नहीं कर पायेंगे और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर देश की बदनामी होगी, समाज में नफरत फैलेगी जो की आज भी कायम है, जो बात आप नहीं लिख पाए में स्पष्ट शब्दों में लिख देता हूँ की आरक्षण सवर्णों के लिए न तो त्याग है और पश्चाताप तो बिलकुल नहीं है ये वो मजबूरी है जिसको सवर्णों को खून के आंसू पीकर देना पड़ रहा है. सच यही है आपने लिखा की सवर्णों को दिल बड़ा करना चाहिए और त्याग करना चाहिए जिस स्तर से आरक्षण शुरू होता है यानी शैक्षणिक स्तर पर जहां स्वर्ण दलित या और कोई भी बच्चे वो मानसिक रूप से केवल मेहनत करके उसके सकारात्मक फल की अपेक्षा रखते हैं, न की त्याग और बलिदान की क्योंकि उन्हें यही सिखाया जाता है की, सब समान हैं और जो जैसी मेहनत करेगा वैसा ही फल पायेगा लेकिन उस समय उन्हें जब ये पता चलता है की तुमसे अंकों में पीछे रहने वाले का उच्च शिक्षा में एडमिशन हो रहा है तो उसे उसमें त्याग नहीं धोखा नज़र आता है और तब उसे समझ आता है की वो स्वर्ण है और वो दलित ....... ! फिर वो चाह कर भी त्याग के विषय में नहीं सोच सकता ...........! डॉक्टर साहब आपका प्रयोगात्मक लेख अच्छा है लेकिन वो सामाजिक असमानता को दूर करने की कुछ संभावनाएं हैं लेकिन जब तक आरक्षण रहेगा तब तक समानता संभव ही नहीं है इस विषय को समझने के लिए एक लिंक दे रहा हूँ http://munish.jagranjunction.com/2012/05/01/%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%A1%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80/

के द्वारा: munish munish

भूपेंदर जी, सादर नमस्कार. सबसे पहले तो मैं आपके परिश्रम और आपके चिंतन को प्रणाम करता हूँ. आरक्षण को लेकर आपने जिस सकारात्मक भाव से विचार किया है, ऐसी सोच विरला ही मिलती है. भूपेंदर जी, आज आरक्षण वोट बटोरने का साधन बन कर रह गया है. हमारे नेता तो चाहते यही हैं के देश में ये बाँट हमेशा बनी रहे. यही कारण है के वो आरक्षण को लेकर कोई सार्थक नीति नहीं बनाना चाहते. आपके लेख को पढ़ कर मुझे ऐसा लगता है के अब समय आ चूका है के हमारे दलित और पिछड़े भाई, जो आरक्षण का लाभ उठा कर विकसित हो चुके हैं, उन्हें स्वयं ही पहल कर स्वयं को आरक्षण से अलग कर लेना चाहिए. जिससे वास्तविक जरुरतमंद आदमी उसका लाभ उठा सके. नहींतो अक्सर देखा गया है के आरक्षण का लाभ वही लोग उठा रहे हैं जो मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं. जरूरतमंद लोग इस लाभ से वंचित हैं. ऐसा करने से स्वर्णों की सोच में सुधार होगा. उन्हें भी पता चल सकेगा के प्रतिभा पर किसी जाति विशेष का अधिकार नहीं है. भूपेंदर जी,जैसा की आपने लिखा है, गरीब और वंचित स्वर्णों को भी obc और sc श्रेंणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. इससे समाज में समरसता आएगी और जाति की वर्जनाएं टूटेंगी. भूपेंदर जी मैं आपके प्रयास को एकबार फिर प्रणाम करता हूँ और भविष्य के लिए आप को शुभकामनाएं देता हूँ. नमस्ते जी.

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

बहुत सही लिखा है   कांग्रेस  सही तरीके से आरक्षण लागू करती तो देस की तसवीर ही कुछ और होती प्रोमोशन मे तो आरक्षण होना ही नही चाहिए पर चोरो के डान ने तो और भी आगे जा कर धर्म  आधारित कर दिया इन गदारो की नीयत ठीक नही सिर्फ वोट तक सीमित है देश जाए भाड मे कांग्रेस गदारो का टोल है इसकी स्थापना हिन्दुओ पर राज करने के लिए हुई थी इसके लिए काफी हद तक तथाकथित उचीजातियां भी जुमेवार  है  कम से कम धार्मिक छूत तो न बनाते ये  शंकराचार्य और मोडे जोंक की तरहबैठे इनकी तरकीके लिए प्रयत्न करते टेरेसा एक लडकी होकर  दूसरे देस मे इतना कर सकती है सारा पूर्वोतर भारत इसाई बना दिया तो ये कमसे कम छूत ही मिटवा देते जहां कांग्रेस हिन्दुओ के लिए गदार है वहां उंची जातियां मार्शल कौमे मोडे व शंकराचार्य भी इस कलंक  से मुक्त नही मैने पेपर मे पढा कि एक शंकराचार्य ने रामदेव के आन्दोलन पर सवाल उठाया कि साधु  सन्तो को इन पचडो मे नही पडना चाहिए यानि हराम की  खाओ पडे रहो जब ये किसी काम के नही कोई प्रचार नही हम क्यो इन्हे सहन कर रहे है इन एस सी-एस टी लोगो ने हिन्दू होने की डबल कीमत चुकाई है धर्म बदलने पर छाती से लगाना हिन्दुओ पर करारा व्यंग है  लेख लाजवाब है बधाई

के द्वारा: snsharmaji snsharmaji

के द्वारा: akraktale akraktale

गरीबी समाज का एक बड़ा अभिशाप है जहां से जीवन की मौलिक समस्या प्रारम्भ होती है... अंग्रेजों के समय जमींदारी करने वाले उनके मातहत सबसे अधिक ऊंची जाति के लोग ही थे। अंग्रेजों को तगड़ा टैक्स देने की विवशता और अङ्ग्रेज़ी भोगवादी जीवन जीने के लालच के चलते मजदूर वर्ग का अमानवीय शोषण हुआ जिसमें अधिकांश तथाकथित नीची के लोग ही थे। अपने स्वार्थों को धर्म की चादर से ढंकने के प्रयासों ने न केवल धर्म को अपमानित किया वरन सामाजिक खाईं को और भी बढ़ा दिया। निश्चित रूप से आज नीची जातियों को सहारे की आवश्यकता है और यह सहारा मानसिकता से द्वेष भाव निकालकर ही दिया जा सकता है। शिक्षा में विशेष सहायता दिये जाने की आवश्यकता है और उसके बाद आरक्षण अराजनैतिक तरीके से लागू होना चाहिए अन्यथा यह तो सत्य ही है कि आरक्षण सामाजिक खाईं को बढ़ा ही रहा है। प्रमोशन मे आरक्षण तर्क से परे है क्योंकि एकबार समर्थ होने के बाद दौड़ने के बैसाखी का कोई महत्व नहीं रहता, इससे केवल आत्मविश्वास ही मारता है और समानता के स्थान पर असमानता बढ़ती है।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

मेरा ये स्पष्ट मानना है की पढ़ाई के दौरान व्यक्ति को अवश्य ही आरक्षण मिलाना चाहिए..यदि व्यक्ति प्रोफेसनल लाइन में है तो पहली बार केवल आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए , एक बार पढ़ाई पूरी हो गयी तो उसे खुद अपने दम पर नौकरी हासिल करनी चाहिए. लेकिन मैंने कई बार महसूस किया है की इंटरव्यूव लेने वाले पैनल में यदि जाति विशेष के लोगो की संख्या ज्यादा होती है तो ऐसा कई बार देखा गया की उसी जाती के व्यक्ति का गलत ढंग से चयन हो गया है अतः पैनल में सभी जाति के लोगो को रखा जाय (ये बात कुछ मित्रो को अटपटी लग सकती है पर मैंने पहले ही कहा है की आज मै प्रयोगवादी बाते करूँगा).. और जब नौकरी लग जाय तो उसके बाद की पदोन्नति भी व्यक्ति के कार्य के आधार पर किया जाय...........बहुत खूब जनाब..........................सार्थक, सुन्दर और अनुकरणीय विचार .................हर्द्की आभार.........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

भूपेंद्र जी, आरक्षण पर आके स्पष्ट विचार उच्च हैं| आरक्षण न कोई पश्चाताप है, न कोई त्याग...असल मैं आरक्षण, सिर्फ वोट बैंक की राजनीति से अधिक कुछ भी नहीं| सभी को समान अधिकार होना चाहिए| जाति, धर्म, वर्ण इत्यादि के कारन विभेद न हो...किन्तु समान अधिकार आरक्षण के माध्यम से नहीं दिए जा सकते...देश में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो सभी नागरिकों को विना किसी सामाजिक, आर्थिक भेदभाव के शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, घर इत्यादि की उपलब्धता सुनिश्चित करे| समाज में वैमनस्य इसी तरह दूर किया जा सकता है..हम निर्बलों का उत्थान करे विना किसी भेदभाव के और इसके लिए आरक्षण का तरीका विल्कुल प्रभावी नहीं है...यदि होता तो इतने वर्षों में समस्या से निजात मिल जानी चाहिए थी| जब तक देश के तथाकथित कर्णधार रुपी नेता कुछ बनाने की वजय करने को मंत्र नहीं मानेगे और इस ओछी वोट बैंक की राजनीती की धरा से नहीं हटेंगे तब तक ये मुद्दा ही बना रहेगा... जय जय...

के द्वारा: Himanshu Nirbhay Himanshu Nirbhay

डॉ. भूपेंद्र जी, नमस्कार! कई मामले में आपका आलेख सराहनीय है. आरक्षण या वैभनस्य दूरियां पैदा करता है. अगर सबको सामान अवसर मिले, शिक्षा सर्वसुलभ हो, जाती प्रथा हो ही न! तो फिर इन नेताओं को भी वोट का कार्ड खेलना बंद हो जायेगा. पर ऐसा चाहेगा कौन? कौन मसीहा आयेगा जो आपके विचारों से पूर्णरुपेन सहमत होकर उसे प्रयोग में लाने लगेगा. नक्सली लोगों में अधिकांश सताए गए लोग हैं, पर उनका इस्तेमाल यही नेता लोग करते हैं. दरअसल पूरी ब्यवस्था में घुन लग गया है इसे जड़ से समाप्त करना होगा ... और उसके लिए हमारे बुद्धिजीवी, इमानदार नेता, और सवर्णों को भी आगे आना होगा! दलित, सवर्ण, पिछड़ा आदि जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल ही बंद होना चाहिए. हम सभी भारतीय हैं और उसी बाल्मीकी, वेद्ब्यास, चन्द्रगुप्त, या राम-कृष्ण के वंशज हैं. सोच बदलने की जरूरत है और जरूरत है इमानदार पहल की. शिक्षक दिवस के दिन सार्थक आलेख प्रस्तुत करने के लिए बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

डो.साहब अब सब जाती के कपडे एक हो गये हैं । स्कूल में नाम के साथ जाती नही लिखवाई होती तो अब तक खोजबीन कर नी पडती ये आदमी किस जाती का है । भाई ये फंडा सरकारी है । आज संसद में दो नेता आसस में लड पडे । आप सचमुच मान गये की वो प्रजा के हित में लडे थे ? बिल कुल नही, अपने लिए लडे थे । अगर प्रजा के लिए लडे होते तो बोलते अभी ईसे साईड में रख्खो, भाजप के साथ मिल कर सरदार की दाढी खिंचते, चलो भाई कुर्सी खाली करो । ईतिहासमें तो भारत की जनता को बहुत सी प्रजाने दुखी किया है । अंग्रेज और मुस्लीम प्रहुख थे । अंग्रेज तो भाग गये । अब मुस्लिम को कोइ कह सकता है की आप के पुरखों ने बहुत सताया है तो आप थोडी तकलिफ उठाओ । बाप के गुनाह की सजा बच्चों को नही होनी चाहिए सब जानते हैं । ईतिहास अगर खराब हो तो भुलने के लिए होता है । याद करने से दुरियां ही बनी रहती है । छुआ छुत आरक्षण से नही जाता । शिक्षा ही एक मात्र रास्ता है । आरक्षण नफरत ही बढाता है । देख लो घटिया साईटमें ईस विषय के लेखमें । कितनी नफरत फैली है । नेता का क्या है, कभी भी पल्टि मार देता है । प्रजा की दुरियां देश के टुकडे ही करवाती है । अगर समान अधिकार नही तो लोकशाही ही कैसी । भारत के पिछडों से ज्यादा पिछडे अमरिकामें काले लोग थे । बिलकुल गुलाम थे । जानवरों के साथ बांध के रखते थे । भेदभाव यहां से भी मजबूत थे । वो लडे सिर्फ भेदभाव के लिए । आरक्षण के लिए नही । आज भेदभाव नही है सिर्फ समानता के सिध्धांत और शिक्षा के कारण । वो अब पिछडे नही रहे । गरीब जरूर है । गरीब किस देशमे नही ? करोडपति रामविलास के पासवान के सामने जीसे खाने के लाले है ऐसे ब्राह्मण को रख के देखो । ब्राह्मण को कुछ नही मिलेगा पासवान को सब कुछ मिलेगा । और उपर से बोलता है " आरक्षण हमारा जन्मसिध्ध हक्क है " ये " जन्मसिध्ध हक्क " कहां ले जायेगा भारत को ? मुझे तो वो रेल्वे वाले अपाहिज ही याद आते हैं । आज ज्यादातर आत्म हत्या कौन करता है ? किसान । किसान पिछडा नही है । अगर दलित आत्म करते होते तो, आज तो उनका दिन था, आसमान सर पे उठा लेते । खेल आप समज नही पाये । प्रजा के भले से नेताओ को कोइ सरोकार नही । लडो, मरो कुछ भी करो, हम में से एक एक मसिहा पकड लो और वोट उसे ही करो । हम नेता मिल जुल कर राज कर लेंगे ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

बहुत सुन्दर  लेख पर इन कुतो को व कुता महारानी को  काबू कैसे किया जाए ईस सबके लिए खुद हिन्दु  जुमेवार है जब तक हिन्दुओ के उपर गान्धी नेहरू का भूत रहेगा इसका कोई ईलाज नही  मुसलमान सिर्फ अपना फायदा देखते है उन्हे देस से कुछ नही लेना म्यानामार पर मुम्बइ मे तोड फोड जबकि असम पर किसी भी हिन्दू मार्शल कौम के वीरो का कोई  नही बोला ये हिन्दुओ के कन्धो  पर पैर रख नेता बने और उन्ही से गदारी करते है लालू हो या मुलायम या मायावती-माया बुध्द प्रतिमा खण्डन  पर नही बोली परराज ठाकरे पर मिजाइल दाग दी दोगले हैं गदारो नेअपना नाम सैकुलर रख लिया है  एक बार बुखारी बोला और केजरीवाल तलवे चाटने पहुंच गया  मुसलमानो के हुकम  बिन हम अपने दुख दर्द  पर आन्दोलन भी नही कर सकते इसलिए ये शनी राहु केतु  हिन्दुओ के सिर पर रहंगे  क्योकि लम्बी गुलामी  ने जमीर मार दिया हैजजिया कर  देकर औरतो की इज्जत निलाम करवाकर हिन्दुओ मे इतनी ताकत नही कि  अपना भला बुरा सोच सकें हां  सिर्फ गरीब हिन्दुओ के ही घर जला सकते हैंजैसे गोहाना व मिर्चपुर मे हुआ जयचन्द मानसिंह बहुत है राजगुरू चन्द्र शेखर सुखदेव बहुत कम - अत कुते लाईलाज हैं

के द्वारा: snsharmaji snsharmaji

वेदों के शव्द सुनने का अधिकार न हो,यदि सुन लें तो उनके कानों में पिघला सीसा डाल दिए जाने जैसे दंड विधान कुछ मुर्खों और दुष्टो की नीच सोच है इसका वेद और वैदिक साहित्य मे विचार ही नही है। प्रमाण- प्रियं मा कृणु देवेषु प्रिय राजसु मा कृणु। प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शुद्र उतार्ये॥1॥ अथर्ववेद काण्ड 19 सूक्त 62 मन्त्र 1 रूचं नो धेहि ब्राह्मणेषु रूचं राजसु नस्कृधि। रूचं विश्येषु शुद्रेषु मयि धेहि रूचा रूचम्॥2॥ यजुर्वेद अध्याय 18 मन्त्र 48 यथेमां वाच कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराज्न्याभ्यां शुद्राय चार्य्याय च स्वाय चारणाय। प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप मादो नमतु॥3॥ यजुर्वेद अध्याय 26 मन्त्र 2 अर्थ- पहले मन्त्र मे प्रार्थना की गइ है कि- हे परमात्मा; मुझे देवों (विद्वानों/परोपकारियों) में प्रिय करो। राजा और राज्यधिकारीयों में प्रिय करों। मुझे सभी देखने वालों (सम्पर्क मे आने वालो) में प्रिय करो। एवं अर्य्य (वैश्य) और शुद्रों मे प्रिय करो। दुसरे मन्त्र मे प्रार्थना है-हे जगदीश; हमारे ब्राह्मणो मे परोपकार की भवना,तेज,प्रेम दो। हमारे शासक समाज मे तेज (आगे बढने का गुण) दो।वैश्यों और शुद्रों मे तेज, प्रेम दो। मेरे अन्दर विशेष तेज ओज(प्रभावशीलता) और कान्ति भर दो। तीसरे मन्त्र मे ईश्वर सभी मनुष्यों को उपदेश देता है- (यथा) जिस प्रकार मै (इमाम् कल्याणीम् वाचम्) इस कल्याणकारी वेदवाणी को (जनेभ्यः) सभी मनुष्यों के लिये (आवदानि) उपदेश करता हूं, वैसे तुम(वेद जानने वाले) भी उपदेश करो। [शेष मन्त्र मे बताया गया है कि वेद का उपदेश किस के लिए है](ब्रह्म्राज्न्याभ्याम्) ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के लिये (शुद्राय) शुद्रों के लिये (च अर्याय) और वैश्यों के लिये (स्वाय च) अपनों के लिये (अरणाय च) परायों के लिए य शत्रुओं के लिए करो। अन्त मे वेद के उपदेशक की प्रार्थना है कि (इह) इस संसार में (देवानाम्) विद्वानो का (प्रियः भूयासम्) मुझे सब उत्तम सुख प्राप्त हों। ऊपर दिये गये वेद मन्त्रो से सिद्ध होता है कि कान में सीसा डालने की बात बकवास है।जिस किताब मे इस बात का समर्थन करा गया हो वह किताब ही गलत है ।

के द्वारा: Sanjay Sanjay

राम राज्य संबध में उठाए गये प्रश्नों का उत्तर आजकल 2 पुस्तकों को रामायाण कहा जाता है 1 महर्षि वाल्मीकि की रामायण 2 तुलसीदास जी की रामचरितमानस महर्षि वाल्मीकि भगवान राम के समकालिन थे इसलिए सभी विवरण इसी पुस्तक पर आधारित है।रामराज्य- आमतौर पर माना जाता है कि उस समय राजा पूरी तरह अपनी मर्जी का मालिक होता होगा परन्तु एसा नहीं था। जिस समय राम वनवास के बाद भरत अपने मामा के घर से आये तो राम के वन जाने के आरे में जानकर केकैयी से पुछा- क्या राम ने बिना अपराध के किसी गरीब या धनी को मारा था ? क्या राम किसी पराइ स्त्री को चाहता था ? किस कारण से उसे वन में भेज दिया गया ? (अयोध्या काण्ड से) इस से पता चलता है कि कुछ अपराधों के करने पर राजा को भी देश से निकाला जा सकता था। छुआछूत तो उस समय थी ही नही क्योंकि `जब राजा दशरथ ने यज्ञ किया तो उन्होने अपने सचिव को आदेश दिया “ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शुद्रांश्चैव सहस्त्रशः । समानयस्व सत्कृत्य सर्वदेशेषु मानवान् ॥ (बालकाण्ड) अर्थ- हजारों(अनेकों) ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों [और] शुद्रों को इस यज्ञ में सम्मान के साथ सत्कार पूर्वक(आदर के साथ) बुलाओ।और दातव्यमन्नं विधिवत् सत्कृत्य न तु लीलया। (बालकाण्ड) सबको विधि के साथ सत्कार करके शिष्टाकार पूर्वक भोजन दो लीला (दिखावे) के लिये नही। जब श्रीराम जी वनवास मे गंगातट के पास शृगबेरनगर के मुखिया गुह नामक निषादराज के पास पंहुचे तो उनसे गले मिले । महर्षि वाल्मीकि ने निषादराज को "राम्स्यात्मसमः सखा" अर्थात अत्यन्त प्यारा मित्र बताया। आगे निषाद राज ने कहा" भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चैतदुपस्थितम्" अर्थात सब प्रकर का भोजन प्रस्तुत है आप स्वीकार करें। इसी प्रकार जब श्रीराम लक्ष्मण जी शबरी के आश्रम मे गये तो "पाद्य्माचमनीयं च सर्व प्रादाद्यथाविधि" उन्हे जल दिया। उसके बाद बेर भी दिये। उपरोक्त विवरण से सपष्ट होता है कि रामायण काल मे छुआछूत तो थी ही नही। वेद के विषय मे अलग टिप्पणी लिखुंगा। मन्दिर की कल्पना तो रामायण तो क्या संस्कृत भाषा मे भी पुराने समय मे नहीं थी। तुलसीदास जी लिखते है- मुदित महीपति मंदिर आये। सेवक सचिव सुमन्त बुलाए ॥ यंहा मन्दिर शब्द का अर्थ सभी अनुवादक (जर्मन लेखक भी जिन्होने सबसे पहले तुलसी कृत रामचरितमानस पर पी एच डी की थी और लिखा था कि सबसे ज्यादा विभिन्न और पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग तुलसी ने किया है) महल ही करते है। रामयण मे रामेश्वर मन्दिर का कोइ जिक्र नही है। शेष अगली टिप्पणी में।

के द्वारा: Sanjay Sanjay

अच्छा है अगर ये बात मोदी तक पहुंचती है तो । अब सुहागरात का तो सवाल नही । बच्चे पैदा होने का भी खतरा नही । जीन्दगी तो साथ नही जीये । अब मरने तक का तो साथ देना चाहिए । अब तो सब कुछ सेट है । भाभीजी का पेंशन भी आता है जीम्मेदारी बडी नही रही अब । जब वो पहेली बार मुख्यमंत्री बना तब उनसे एक साल बडा, उन का पडोसी आदमी, जो बचपन में उन के साथ खेल चुका था वो गालियां दे रहा था । अब वो लुख्खा ( निर्धन, बेरोजगार) नही रहा, अब तो बहु को लाना चाहिए । उन के चाहनेवाले लोगों की यही भावना थी की वो घर संभाल ले । मीसीस नरेन्द्र मोदी लिख कर गोगल किजीए तो युट्युब से एक विडियो मिलेगा उस मे उन के साले साहब आप को मिलेंगे लोकों को अपील करते हुए, अपनी दीदी के लिए । उन की शादी के गवाह भी पेश किए गये हैं, कागजी प्रमाण भी । विडीयो तो आब आया है मै १९८४ से जानता हुं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

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श्री दिनेश जी , सादर प्रणाम सर्वप्रथम आप को अच्छा महसूस हुआ यह पात्र ,इससे मुझे इस पात्र को आगे बढाने का साहस मिल रहा है, आपको निश्चित ही पता होगा की उत्तर भारत में यह परंपरा रही है की जिस व्यक्ति को सीधा साधा दिखाना है ,उसे भोजपुरी बोलने वाला ही बना दिया जाता है ऐसा हमारे लेखनी में भी हुआ है ,ऐसा हमारे बोलीवुड के फिल्मो में भी खूब देखने को मिलाता है .... इस कारण कतिपय ऐसा चुक हो गया है .. भारोदिया जी जो को भोजपुरी छेत्र के नहीं है उन्हें भी ऐसी ही समस्या आई है . आगे से संवाद का टोन तो यही रहेगा पर कोई भी ऐसा भोजपुरी शब्द नहीं डाला जाएगा जो खड़ी बोली हिंदी में उपलब्ध न हो ..... यदि कही बहुत जरुरी लग गया तो उसका अर्थ साथ में रहेगा..

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

श्री जवाहर सिंह साब , सादर चरण स्पर्श कोई कितना भी खराब रसोइया क्यों न हो,उसे अपना खाना कभी भी खराब नहीं लगता , कुछ वैसा ही हाल लेखक के साथ भी होता ही है , मेरा लेखन अच्छा है या कूड़ा ये आप लोगो को बताना है , और आप जैसी वरिस्थ बंधुओ का फैसला मुझे स्वीकार्य होगा , लेखन के लिए विषय की कमी नहीं है ,पर ऐसा इसलिए मैंने शुरू किया क्योकि फेसबुक इत्यादी सोसल साईट पर चुटकुले के नाम पर संता बनता जोक्स , नॉन वेज जोक्स टहल रहे हैं लेकिन यदि हम लेखको के प्रयास से यदि चुटकुले जैसे सुद्ध टाइम पास चीज में भी हमारे देश के युवा सम सामयिक मुद्दों पर राष्ट्रवादी विचार जान सकते है तो कितना अच्छा और पुण्यता का कार्य होगा...

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हाथ जोड़कर नमस्कार भूपेंद्र जी, क्षमा करें किन्तु मैं कुरान की अति गहराई में नहीं गयी और न ही जाना चाहती हूँ, कहने वाले कहते है की इतिहास अधिकतर झूठ से भरा हुआ है.और वैसे भी वास्तविक कुरान तो आज ढूढने से भी नही मिलेगा, हाँ कुछ इस्लामिक किताबें, मनुस्मृति व् उपनिषद के कुछ ऐसे अंशों को मैंने पढ़ा है जो एकदम सामान हैं और पढने के बाद मेरी मानसिकता एकदम धुल गयी है. तथा उसी को सत्य मान मैं जीवन पालन कर रही हूँ कुरान के कुछ अंश जो महिलाओं के सम्बन्ध में हैं से मैं भी सहमत नहीं हूँ,कारन पढ़कर स्पष्ट ऐसा महसूस होता है किसी ने महिलाओं को इन्सान नहीं केवल उपभोग की वस्तु समझ ये अंश स्वयं लिख दिए हैं. बेहरहाल अपनी मानसिकता धुल जाने के बाद मैं अपने बारे में केवल इतना कहूँगी की मैं आशीष पाने केवल एक ही पवित्र धार्मिक ग्रह नही बल्कि हर जगह आशीष पाने जाती हूँ और मन को जीवन को पवित्र महसूस करती हूँ..

के द्वारा: amanatein amanatein

श्री जवाहर लाल जी , पहले तो मै ये बात स्पष्ट कर दूँ.. की प. पु.सुदर्शन जी नमाज़ पढ़ने नहीं जा रहे थे वो ईद की बधाई देने ईदगाह जा रहे थे.. परन्तु जब उन्हें रोका गया तो उन्होंने कहा की मै तो ईदगाह जा रहा हु सो पुलिस वालो को लगा [या लगाया गया ] की वो नमाज पढ़ने जा रहे है.. दूसरी बात वो मुर्ख व्यक्ति नहीं है वो इस मुद्दे पर मुस्लिम धर्मगुरूओ को से बात करने में लगे है की चुनाव के दौरान आखिर में केवल दो शुरूआती अधिक मत पाने वाले व्यक्ति का अलग से चुनाव कराया जाय...से इससे बाधा फायदा ये होगा की चुनाव में दस से बीस प्रतिशत मुस्लिम वोट जिधर जाते है वो जीत जाता है वाला सिस्टम ख़तम हो जायेगा सो काफी हद तक तुस्टीकरण की राजनीति भी कम होगी ... और इस मुद्दे पर सबसे प्रसिद्द शिया गुरु मौलाना कल्बे शादिक ने उनका समर्थन भी किया है

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

आदरणीय डॉक्टर साहब, आपका आक्रोश जायज है, प्रचीन काल से आज तक हिन्दुओं ने  जो भी अत्याचार सहे हैं। उसके में उनका सहिष्णुता का सिद्धाँत रहा है। हमारी अहिंसक प्रवृति इसके हमारी बरवादी के लिये जिम्मदार है। यह कह कर मैं हिंसा का समर्थन नहीं कर रहा, बल्कि मेरे कहने का आशय है कि हिंसक के साथ हिंसक बनो और अहिंसक के  साथ अहिंसक। हम पर अल्पसंख्यकों के हावी होने का प्रमुख कारण है हमारा जाति में बँटा होना तथा हमारे अंदर उच्चजाति का दम्भ होना और अमानवीय ढ़ंग से स्वधर्म के लोंगो के साथ उपेक्षित व्यवहार करना। उन्हें हीन दृष्टि से देखना। सामान्य मानवीय  अधिकारों से व्यवहार रूप से वंचित करना। मुम्बई में 50 हजार लोगों का इस तरह  उत्पात मचा देने का प्रमुख कारण हमारी कमजोरी है। उनका साहस नहीं। यदि आज हम संगठित हों जाय तो भारत के क्या विश्व के अन्य सम्प्रदाय के लोगों की हमारे ओर नजर उठाकर देखने का साहस भी नहीं  होगा।  जिस ईद को शांति एवं प्रेम के लिये बनाने की शुरुआत हुई थी, आज उसने अन्य धर्म के  लोंगो से नफरत एवं समाज में अशांति फैलाने का रूप धारण कर लिया है। ये लोग ऐसा करके मुहम्मद साहब का अपमान करते हैं। संभवतः उन्हें इस बात का अहसास भी नहीं। सच कहूँ तो मुझे बचपन से ही जब अधिक समझ भी नहीं थी, हिन्दुओँ की होली और इस सम्प्रदाय के सभी त्यौंहारों में हिंसा नजर आती थी। ऐसा लगता था कि यह त्यौहार केवल हिंसा के लिये ही बनाये गये हैं। इस सम्प्रदाय में कुछ अच्छे लोग भी हैं, लेकिन वह संख्या में इतने कम हैं कि उनकी आवाज गुम हो जाती है। जो मुम्बई में हुआ, लखनऊ में हुआ तथा इलाहाबाद और बरेली में हुआ, वह सब सुनियोजित  एवं सरकार के कुछ लोंगो द्वारा संचालित किया गया लगता है। यह सब हुआ है सत्ता को पुनः  प्राप्ति का मार्ग स्थापति करने के लिये। क्योंकि ऐसा सरकार रवैया सिद्ध करता है। अन्य किसी  प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। यदि हमने शीघ्र ही हिन्दुओं को संगठित करके जातिविहीन समाज की कल्पना नहीं की तो हमें  इनके और भी आतंक देखना एवं झेलना पढ़ेंगे। आपने अपने आक्रोश को जिस व्यंगात्मक शैली में प्रस्तुत किया है, वह निश्चित ही मेरे हृदय को आन्दोलित कर रहा है।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

महाशय मैं आपकी तिलमिलाहट समझ सकता हूँ... ये बात बहुत से लोगों को समझ में नहीं आ रही है... सब अपने घर में मजे लेने में व्यस्त हैं और इस विश्वाश में जी रहे हैं कि उनके साथ कुछ नहीं होने वाला... मगर इतिहास के आकड़ें भयावह हैं...वास्तव में वर्तमान के आकड़ें भी बड़े गंभीर संकेत दे रहे हैं...जयचंद जो कि मुहम्मद गोरी कि बड़ी मदद करता था बाद में वो भी मुहम्मद गोरी के हाथों मारा गया....और उसके बाद क्या हुआ इतिहास गवाह है....जजिया कर देकर और अपनी बहु बेटियों को लुटा कर हिन्दुओं कि आत्मा मर गई है..... आज कांग्रेस असम में जिसे अपना बड़ा वोट बैंक समझ रही है वो ही आने वाले सालों में उसके लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है... ये बात तरुण गोगोई को महसूस होने लगी है.... एक तरफ ये तथाकित शांति प्रिय लोग हैं जिन्होंने अपने असम ( घुसपैठ) और बर्मा (बौद्ध लड़कियों के साथ बलात्कार) के भाईयों की गलत हरकत से इस देश का जीना मुहाल कर रखा है.. वही दूसरी तरफ हिंदूओ जैसे बेवक़ूफ़ भी हैं जो पाकिस्तान में मारे जा रहे हिन्दुओं और उनकी लड़कियों के साथ बलात्कार और धर्म परिवर्तन की घटनाओं पर साम्प्रदायिक सौहाद्र की बातें कर रहे हैं... वाह क्या बात!!!!!!!! जहाँ एक हिन्दू एक तरफ श्री कृष्ण के बड़े भक्त हैं वही हिन्दू गीता के मूल सन्देश को भूल गए.... वास्तव में मुझे लगता है ये सनातन धर्म जो गीता पे विश्वाश करने वाला था कई साल पहले ही ख़त्म हो गया मात्र हिंदुत्व के अवशेष मात्र रह गए हैं... अफ़सोस होता है.... ये देखकर ...

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

डॉ. भूपेंद्र जी, नमस्कार! आलेख के शीर्षक से मैं थोडा भ्रमित हो गया था इसलिए पूरा लेख पढ़ नहीं सका था. अभी पढ़ा हूँ और आपके तीखे व्यंग्य में राष्ट्रभक्ति के भाव देख सकता हूँ ... पर हमारे हुक्मरान को क्या कहें ... सोनिया जी कहती हैं सब ठीक-ठाक हैं मनमोहन सिंह की इतनी हिम्मत कैसे हो सकती है कि वे 'मैडम' के खिलाफ एक शब्द भी बोल दें. आखिर उनके संसदीय क्षेत्र का राज्य है तो क्या हुआ? पंजाब में भी सिक्खों पर भी आंच आयेगी तो पहले 'मैडम' से पूछेंगे फिर मुंह खोलेंगे! अंत में - अंधेर नगरी चौपट राजा के सिवा क्या कह सकता हूँ! दुःख इसी बात का है कि हम हिन्दू बहुसंख्यक होकर भी चुपचाप टी वी से चिपके रहने के आदी हो गए हैं ....

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: अनिल गुप्ता अनिल गुप्ता

श्री आकाश सेन जी (माफ़ी चाहूँगा यदि नाम में कोई गलती हो) इसको कई जगह से इकठ्ठा करके यहाँ संगृहीत किया गया है ... कुछ के बारे में मै बता दे रहा हु जागरण और हिन्दुस्तान के घोटाले की बात मीडिया दरबार की वेबसाइट से ली गयी है.. जागरण के एक निदेशक महेंद्र मोहन गुप्ता सपा से संसद है.. सुब्रोतो राय के बारे में सबको पता है लोक मत के एक निदेशक विजय दर्डा कांग्रेस से सांसद है. टाटा जी की बात इन्टरनेट पर उजागर हो गयी था, प्रभु चावला की भी बात इन्टरनेट पर टेप करके ड़ाल दी गयी थी . और अन्य जानकारी फ़्रैन्कोइस के रिसर्च से लिया गया है जिसे मै आपको ईमेल कर दे रहा हु ... क्योकि उतना बड़ा मैटर यहाँ रखना संभव नहीं है.. संतुस्ट होने पर आपके उत्तर की प्रतिच्छा करूँगा..

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

कुमार गौरव जी सर्वप्रथम जन्माष्टमी की हार्दिक शुभ कामना... मुझे इस अवसर पर डॉ. कलाम साब की एक बात याद आती है .. उन्होंने कई बार कहा है की मई भारत के युवाओं से बहुत उम्मीद रखते है.. क्योकि यहाँ की १०% युवा आबादी देश समाज के बारे में सोचती है.. इसी प्रकार आर एस एस के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरु जी से एक INTERVIEW में पूछा गया की आप संघ के संकल्प को कब पूरा मानेंगे तो उन्होंने उत्तर दिया की शहरी एरिया में 2% और ग्रामीण एरिया में १% स्वयंसेवक जिस दिन तैयार हो जायेंगे हमारा संकल्प पूरा हो जायेगा.. और आपके अनुसार अभी भी २५% हिन्दुओ में जाग्रति बची है अतः उनको एक रखकर उनको राष्ट्रवाद की सीख देनी चाहिए.. नहीं... बल्कि देनी ही पड़ेगी यदि हमें अपना अस्तित्व बचाना है तो.. अतः हमें निराशा भाव छोड़कर इन जागृत लोगो को संगठित करना होगा.. संघे शक्ति कलयुगे

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

श्री सिंह साहब जन्मास्टमी की हार्दिक शुभकामना.... एक साल पहले की बात है संघ समर्थको द्वारा एक नामी पत्रिका निकलती है जिसका नाम है 'राष्ट्रधर्म' इस पत्रिका को श्री दीनदयाल जी ने शुरू किया था बाद में अटल बिहारी बाजपेयी जी ने इस पत्रिका के माध्यम से राजनीति में सशक्त दस्तक दी थी , उस पत्रिका को लेकर कोई बड़ा कार्यक्रम था . उसमे संघ के पूर्व सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी मुख्य अथिति थे और बी जे पी के अध्यक्छ नितिन गडकरी विशिस्ट अतिथि थे, मुझे भी कार्यक्रम में आमंत्रण था , वह पर ९०% संघ के स्वयंसेवक थे,काफी भाषण वाषण चला फिर कार्यक्रम की आखिरी बेला आई चला चली होने लगी तो सुदर्शन जी ने लोगो को रोक लिया फिर पुचा की कितने लोगो के घर अखबार या पात्र पत्रिकाए आती है ज्यादातर लोगो ने हाथ उठाया फिर पूछा की कितने लोग राष्ट्र धर्म मंगाते है हाथ उठाने वालो की कुल संख्या १० % भी नहीं थी.. तो ऐसी स्थिति है पात्र पत्रिकाए संघठन उपलब्ध तो करता है पर लोगो की आदत खराब हो गयी है वो हिंदूवादी बाते नहीं पढ़ पाते है चाहे हो स्वयंसेवक ही क्यों न हो

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

डॉ. भूपेंद्र जी कृपया आप को इस ब्लॉग ऐसे विचारो को व्यक्त करने चाहिये जो देश कुछ में बदलाब करे न की जो देश कट्टरपन फैलाये और देश को दंगो की आग में झोक दे.जिस आप का और देश दोनों का ही नुकसान है.आप ने अपने नाम के आगे जो डॉक्टर लगा रखा उस के आप को सही मायने तक नहीं पता है.डॉक्टर को हम सब दुनिया का खुदा कहते जब खुदा आप ने बनाए किसी बशिदे फर्क नहीं करता तो आप कौन होते उस को किसी रूप में पूजाने वालो पर अंगुली उठने वाले.यह कौन सी अच्छी बात है अगर कोई गलत बोलता है या करता है तो हम भी उसी भाषा में ही जवाव दे तो आप में और उन में क्या फर्क है.कृपया आगे से इस प्रकार के भडकाऊ ब्लॉग लिखने से पहले यह सोचे की इस तरह के ब्लॉग का आप के देश पर क्या फर्क पड़ेगा और आप देश को किस और बढ़ता देखना चाहते बर्बादी की ओर या विकास की ओर आगे इस बात विचार कर की ही ऐसे ब्लॉग लिखे धन्यबाद

के द्वारा: ilaagupta ilaagupta

देश को आप जैसी बहनों की आवश्यकता है जो आगे आकर,  जेहादी मंसूबे पालने वाले लोंगो को जवाब देकर, साम्प्रदियक सैोहार्य  को मजबूत करें। हम आपका सम्मान करें आप हमारा सम्मान करो। हम जिओ और जीने वाले सिद्धांत में विश्वास करें। हमें धर्म और जाति  के आधार पर बाँटकर ही तो पहिले अंग्रेंजों ने हम पर शासन किया और अब यह भ्रष्टाचारी नेता कर रहे  हैं। इस मंच का माहौल केवल एक दो लोग  ही खराब करते हैं। कमियाँ तो सबमें हैं, लेकिन हमें अपनी कमी को देखना एवं सुधारना चाहिये न कि दूसरों की कमी पर उँगुली उठाकर अपनी कमी को भूल जाना चाहिये। वर्तमान में जो धर्म और ईश्वर की व्याख्या की गई है मैं उसमें विश्वास नहीं करता। लेकिन तथाकथित धार्मिकों से अधिक धर्म और ईश्वर को  मानता हूँ। आपकी सोच को नमन.......

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

मेरे दिमाग में उपजे कुछ सवालों का आपने लेख के रूप में बहुत सुन्दरता से जवाब दे दिया है ...ये तो वास्तविकता है ही की हम सभी पहले हिन्दुस्तानी है चाहे कोई कितना भी इनकारी हो. दरअसल अशिक्षितों की एक बहुत बड़ी जमात मुस्लिम समाज में मोजूद है , यही कारण है की ये लोग अपनी समझ से कोई सही गलत फैसले लेने में सक्षम नहीं है बल्कि हर छोटी छोटी परेशानी का हल मुल्ला मोलवियों के पास ढूंढते है जिनमे से अधिक खुद अज्ञानी हैं और तो और मुस्लिम समाज में फेली जिन कुरीतियों को दूर करने की शिक्षा देनी चाहिए वो तो ०% ही है और रहेगी क्यूंकि लिखा है खुद कुरान में की एक दिन मुसलमान अपनी तबाही का कारन खुद बनेगा क्यूंकि उसे खुदा में तो अँधा विशवास है लेकिन इल्म ( शिक्षा) में नहीं ..जिसे पाने के लिए कुरान में बहुत जोर दिया गया है . इश्वर हम सभी को नेकी दे....आमीन ...शुक्रिया

के द्वारा: amanatein amanatein

आप सभी को हाथ जोड़कर नमस्कार, लेख पढ़कर पूरी तरह मालूम हो रहा है की मुल्ला जी कुछ नहीं बल्कि कुछ भी नहीं जानते. हिन्दू ज्ञान तो दूर की बात है व् इस्लाम धर्म के बारे में ०% ज्ञान रखते हैं. दरअसल हकीक़त में इस तरह के मुल्लाओं ने कुरान का अर्थ ही बदल कर rakh दिया है. वास्तविक कुरान तो आज ढूंढने से भी नहीं मिलेगा. मुल्लाजी की समझ में कुछ आ जाये और आपकी भी कुरान के बारे में कुछ ग़लतफहमी दूर हो इसके लिए कुरान की एक बहुत सुन्दर आयत का वर्णन कुछ यूँ है कि "ऐ बन्दों जो लोग दुसरे देवी देवताओं को पूजते हैं कभी भी उन देवी देवताओं को गाली मत दो."एक और जगह लिखा है" गैर मुस्लिम भी मेरे ही बन्दे है कभी उनसे कट्टरता से पेश न आओ. लिखा है "दुनिया में हर कोई मेरा बंदा है हर किसी के साथ नरमी से पेश आओ और सदा दयालु बनो. लिखने तो और बी बहुत कुछ है लेकिन समझदार तो केवल एक ही वाकये से संतुष्ट हो जायेगा इसलिए मुल्ला जी जैसे लोग ग़लतफहमी न फेलायें दुसरे धर्मो को गाली देना अपने धर्म को गाली देना है ये भी कुरान ही कि आयत है सो जियें और जीने दे पर अमल करें ....धनयवाद, जय हिंद.

के द्वारा: amanatein amanatein

भूपेंद्र जी नमस्कार आपके हिंदूवादी लेखों का मैंने हमेशा समर्थन किया है. मैं एक कट्टर हिन्दू हूँ और मुझे ये कहने में न कोई डर है और न कोई शर्म. ये शब्द मेरे लिए गाली नहीं बल्कि एक सम्मान है. मुझे वास्तव में ऐसे लेखों पर हंसी आती है जिनमें हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कारों को "उन्मादी" और एक धर्म विशेष को बेहद "नेकी का नुमाइंदा" बताया जाता है. चलिए मैं ऐसा लिखने या सोचनेवाले लोगों से कुछ सीधे सवाल करता हूँ... १) भारत के प्राचीनकाल के हिन्दू राजाओं ने कितनी मस्जिदों को तोड़ के वहां हिन्दू मंदिरों का निर्माण कराया? २) प्राचीनकाल में कितने हिन्दू राजाओं ने सिर्फ लूटमार करने के लिए आसपास के मुस्लिम देशों पर आक्रमण किये? ३) कितने हिन्दू राजाओं ने अपनी मुस्लिम जनता पर दबाव डाला कि वो अपना मजहब छोड़ के हिन्दू धर्म अपना लें? ४) कितने हिन्दू राजाओं ने मुस्लिम राजाओं को मार के उनकी बहु-बेटियों को अपने "हरम" में कैद किया? ५) कितने हिन्दू राजाओं ने अपनी मुस्लिम जनता पर "जजिया कर" लगाया? ६) कितने हिन्दू राजाओं ने गैर-हिन्दू धर्मस्थलों के टुकड़े "मांस तौलनेवाले कसाई" को दे दिए? चलिए ये तो प्राचीनकाल की बात हुई. अभी आधुनिक युग में भी ऐसे ही सवाल पूछे जा सकते हैं...... मैंने जो भी सवाल पूछे जाहिर है उनका उत्तर क्या होगा......लेकिन रास्ता अंधे को दिखाया जाता है बेवकूफों को नहीं.........

के द्वारा: कुमार गौरव अजीतेन्दु कुमार गौरव अजीतेन्दु

अपनी प्रतिक्रिया भी शामिल कर लो डो. साहब सैमा बहेन नमस्कार पहले तो मैं आप को दाद देता हुं की आप समाज को सुधारने का जजबा रखती है, वरना बूरके में कैद करनेवाले समाज में ये बहुत मुश्कोल हो जाता है । धर्म समाज का बहुत बडा अंग है । और धर्मों को सुधारना जरूरी भी है । लेकिन शरुआत हमेशां घर से करनी चाहिए । अपना घर पहले सुधर जाए तो दुसरे घर को सुधारना आसान बन जाता है । कोइ ताना तो ना मारे पहेले आपना संभाल । आप को एक बात बताना चाहुंगा । भारत की बात नही है, विदेश का एक मुल्ला ईस्लाम से तंग आकर ख्रिस्ति बन गया । क्यों की वो मुल्ला था तो कुरान असली भाषामें पढ सकता था. उसने शब्दसः अंगेजीमें अनुवाद कर दिया । पूरा का पूरा कुरान नेट पर रख दिया । कोमेंट देनेवालों ने गालियों की बौछार कर दी । कुरान में ऐसे खराब प्रसंग होते हैं किसी को मानने में नही आ रहा था । या तो मान के भी अंधश्रध्धा के कारण विरोध कर रहे थे । बहेन जी, पहले तो कुरानमें से महम्मद के बारेमें लिखे गये खराब वर्णन या प्रसंग को निकलवा दो । वो सब लिखा गया था तब प्रजा बहुत ही जाहिल थी आज के मुकाबले । लिखते समय सामाजिक परिस्थियां रही होगी । और लिखने वाले आज के मुल्ला के मुकाबले बहुत ही पिछडे हुए थी । वो पूराने थे तो ईसी वजह से अहोभाव मे आ कर सर पे नही बैठाया जा सकता । हर काल खंडमें मौजुदा मुल्ला ही सही साबित हो सकता है । उन की ही जिम्मेदारी होती है धर्म को सही दिशा देने की । हम या आप कुछ नही कर सकते ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय डॉ. भूपेंद्र जी, सादर अभिवादन! सर्वप्रथम आपको 'नमन' करना चाहूँगा इस महत्वपूर्ण आलेख को प्रकाश में लाने के लिए, उसके बाद दिनेश जी की उपर्युक्त कविता रूपी विचार के, जिसमे उन्होंने बिना किसी का नाम लिए अपनी नास्तिकता(?), नहीं आस्तिकता को प्रमाणित कर 'विवादित' बन गए. मेरे ख्याल से सभी ब्लोग्गर को यह ब्लॉग पढ़ना चाहिए और अपने स्पष्ट विचार और भाव यहाँ रखने चाहिए. जागरण जंक्सन को भी आपके ब्लॉग को महत्व देनी चाहिए, यह मैं उनके विवेक पर छोड़ता हूँ. अंत में मैं सभी आदरणीय मित्रों से अनुरोध करता हूँ कि आपकी और दिनेश जी की भावना को समझने का यत्न करें! फिलहाल आभार सहित ..... फिर आऊंगा इसी ब्लॉग पर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय भूपेन्द्र जी, सादर नमस्कार।  किसी अन्य सम्प्रदाय या धर्म के बारे में अतार्किक बातें लिखने का उन महाशय को क्या आशय है। मेरी समझ से परे था। उन महाशय ने जाने कहाँ से उल्टी सीधी बातें रखकर अपनी अज्ञानता का  परिचय दिया है। यदि उन्हें बहस करना है तो खुले मंच पर करें। वो एक बार पूरी निष्ठा से वेदों को पढ़कर देखें। वह बाकी सारा ज्ञान भूल जायेंगे और उन्हें अपना ज्ञान थोथा लगेगा। हम सहिष्णु हैं अहिंसक हैं, इसका यह अर्थ नहीं की कोई भी उसे हमारी कमजोरी समझकर और हमारे असंगठित होने का फायदा उठाकर, हम पर कैसे भी आक्रमण करता रहे। हम सहिष्णु और अहिंसक हैं इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम कायर होकर अनर्गल एवं अतार्किक आरोंपो का तार्किक उत्तर देने में असमर्थ है। हम साम्प्रदायिक सद्भावना में विश्वास रखते हैं। देशभक्ति को धर्म और भारतीय  संविधान को सबसे बड़ी धार्मिक पुस्तक मानते हैं। धर्म एक जीने का तरीका होता है न कि और  सम्प्रदाय की हत्या करने का और उन्हे लूटने का। मलिक साहब ने पहले भी इसी तरह के आलेख लिखे हैं। मैं इनके इस तरह के आलेखों में कई बार प्रतिक्रिया दे चुका हूँ। लेकिन यह न तो कोई उत्तर देते हैं और न ही इस तरह के आलेख लिखने से बाज आते हैं।  ऐसे समय में कहाँ जाते हैं धर्म की ढींगे मारने वाले,  अपने आपको धर्म के रक्षक और ज्ञाता बताने वाले मेरी बातों से आहत होने वाले। ऐसे समय गायब हो जाते हैं अपने आपको धर्म का ठेकेदार कहने वाले। यदि आप कुछ त्याज्य शब्दों का प्रयोग न करते तो मुझे खुशी होती। यह अलग बात है कि जो जिस भाषा को समझता हो तथा जिस भाषा में बात करता हो उसे उसी भाषा में उत्तर देना चाहिये। देखते हैं कौन कौन आपका समर्थन करता है।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

भूपेन्दर जी, इसका कारण है, अन्ना की टीम कई तरह की विचार धाराओं के  लोंगो से मिलकर बनी है। यह भी सच है दोंनो का राजनैतिक एजेन्डा है। फर्क इतना है कि रामदेव जी का स्पष्ट है और अन्ना टीम का अस्पष्ट। दोंनो के सत्ता पर भी काविज होने की संभावना है। रामेदव जी से सत्ता के केन्द्रियकरण हो जाने से सरकार के तानाशाही होने की आशंका रहेगी और अन्ना टीम के सत्ता के विकेन्दिय करण के कारण, विखराव। हाँ यदि दोने एक साथ मिलकर साझा कार्यक्रम बनाकर सत्ता पर काविज होते हैं तो यह देश के भविष्य के लिये बहुत ही अच्छा होगा।  आपका मेरे दिये गये लिंक पर प्रतिक्रिया देने के लिये हृदय से आभार.....

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

भुपेन्द्र अगर ये फोटो आसाम के दंगे से संबन्धित ना हो तो ईसे निकाल दो, यार । बहुत बिभस्त है । ऐसे फोटो लगाना ठीक नही । सेक्युलर ही समस्या की जड है । विडंवना ये है की गद्दार हिंदु भी ईस में शामिल है । बाकी हिंदुओ को अकल नही । ओवर शरिफ बनते है । अपनो को दगा दे कर दुसरों का भला करना है । आप ने ठीक याद दिलाया ये नाम में भूल गया था । राजदीप सरदेसाई । ये और एक गुजराती पत्रकार धिमंत त्रिवेदी । गोधराकांड के पहले से ही नरेन्द्र मोदी के पिछे पडे हुए थे । ये उस समय स्टार न्युज में था । दंगा होते ही ईन दोनो को मौका मिल गया । मुस्लिमो को ढुंढ ढुंढ कर केमेरा के सामने लाने लगे और जैसे गुजरात का राज्यतंत्र ठप्प हो गया हो ऐसे ऐसे बयान लेने लग गए । दोनोंने ही तय कर लिया की मोदी के ईशारे दंगे हो रहे हैं । और सिर्फ मुस्लिमों के बयानों द्वारा बाकी दुनिया को दिखा दिया । और मोदी विरोधियों के हाथमें लड्डु आ गया । ईतने लड्डु की आज तक खाये जा रहे हैं खतम नही होते ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

ये स्साले नेता अभी भी मोदी के पीछे पड़े ..... हकीकत से मुह मोड़ रहे...अब वो दिन दूर जब आग इनके घर में पहुचेगी... अभी छदम सेकुलरवादी नेता मिनिस्ट्री पा के उछल रहे है अपना पैसा स्विस बैंक में भर रहे है...लेकिन क्या होगा इस पैसे का ...क्या होगा इनके बच्चों का भविष्य .क्या होगा आने वाली पीढ़ी का ..ये सब इन्हें समझ नहीं आ रहा... इतिहास सामने है... वर्तमान सामने है..इतिहास गवाह है कि गौरी ने जयचंद का इस्तेमाल करके उसे भी मार डाला था...क्या हुआ जयचंद के राजपाट, सम्पदा का ..बताने कि जरूरत नहीं है ... फिर भी बात को लोग घुमा रहे हैं.... सच एकदम सीधा है उसमें बहस की कोई जरूरत नहीं... बात है तो मामले को सीधा करने की.. सही कदम उठाने की ..... ये सोचने की जरूरत है हर किसी को .... हर शहर हर गाँव में जाके देखिये क्या हाल उन जगहों का जहाँ पे मुस्लिम बहुलता से हैं.... कुछ वायरस जैसी बात तो नहीं????? एक दम से बहुत जनसँख्या वृद्धि..मुझे हालीवुड फिल्मों कि याद आती है ये सब देखकर ..जोम्बी ..या वैम्पायर की ... जो देश पूर्ण रूप से मुस्लिम राष्ट्र है क्या वो खुश हैं ?? क्या वो विकसित हैं.?? क्या उनका तकनीकी में कोई योगदान है ?? क्या वहां कोई रचनात्मक काम हो रहा है...या केवल विध्वंसात्मक काम हो रहे हैं??? प्रोडक्शन के नाम पे केवल केवल पापुलेशन !!!!!! http://yogeshkumar80.jagranjunction.com/2012/07/26/और-ये-रहा-कोकराझार

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

अगर कोई मुस्लिम धरम की प्रॉब्लम की बात करे तो वो गैर साम्प्रदिक और वही हिंदू की समस्याओ की बात करे तो साम्प्रदिक   कम से कम हिन्दुओ को उनकी संख्या के प्रतिशत का सम्मान यआरक्षण तो दो  जैसे की बाकि धर्मो को देने के लिए परेशां हो एक मुस्लिम को हिदू  केसरिया पहेना कर जरा तिलक लगा कर दिखाये , उसे बोले जरा चर्च में  इसाईं टोपी पेनें कर बहार आये आखिर हिंदू ही क्यों ..... ये वंदे मातरम नहीं बोलते ...क्यों ... ये किसी हिंदू पूजा नें नहीं शामिल होते किसी मंदिर में नहीं जाते  और एक भी ऐसी दरगाह बताओ जहा हिंदू नहीं जाता ... और सब छोडो  इनसे पाकिस्तान मुर्दाबाद कहला के दिखाओ ... और  हा जैसे नेता की आपकी तमन्ना की है जरा एक नाम तो बताये  किसी भी दल से हा और वो समानता की बात करता हो आरक्षण और जातिवाद की नहीं  मेरा ज्ञान वर्धन होगा और आपका भी ....ज

के द्वारा: sandeepdeora sandeepdeora

मित्रवर , नरेंदर मोदी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाने में असफल हुए है ,दुसरे शब्दों में कह सकते उनके प्रयास इस मिथ को और तोड़ते से प्रतीत होते है , मै इसके लिए वंहा के दंगो , SIT की रिपोर्ट ,राहुल भट्ट के वक्तव्य ,और जाकिया जाफरी के हलफनामे को इसका आधार नहीं बनाना चाहता , ———- इसके लिए में समय समय पर सार्वजानिक मंचो पर उनके मुस्लिम विरोधी तहरीरे की तरफ ध्यान ले जाना चाहूंगा , उस दृश्य की तरफ आपका ध्यान खीचना चाहूँगा ,जब सद्भावना दिवस पर इक मुस्लिम इमाम की सद्भावना टोपी को उन्होंने अपने सर पर पहनने से इनकार कर दिया था , ——– देश को ऐसे नेता की जरुरत है ,जो सारे वर्णों ,धर्मो ,जातिओं को इकरूप में देखे ,अतः में इस विषय पर आपसे असहमत हूँ !

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

मित्र भूपेंद्र भाई आप की एक एक बात सही है । आपने कहा मोदी बेहद दृढ संकल्प व्यक्ति है । बात बिलकुल सही है । ये संकल्प है देशसेवा का । ये संकल्प १९६५ के युध्ध के दौरान लालबाहादुर शास्त्री और अर.एस.एस के आह्वान पर लिया था १६-१७ साल की आयु में । उस समय गुजरात के हर स्टेशन पर, हर रोड पर जहां सैनिकों की गाडियां निकलने की संभावा थी, युवा लडके तैनात हो गए थे मदद का सामान ले के । शायद सैनिकों को कुछ चीज की जरूरत पड जाए । उस जमाने में माबाप के आगे बच्चों का कुछ नही चलता था । तो मा बापने जशोदाभाभी से उनका ब्याह करवा दिया,१९६८ में । लेकिन देश सेवा की ईतनी लगन लगी थी जशोदाभाभी का स्विकार नही किया चल पडे घर छोड कर । भाभी अपने पिता के पास चली गई । तलाक लेने में नरेन्द्रभाई की बेदरकारी हो गई, तलाक नही लिया । भाभी जी ने टिचर के नौकरी कर ली और राह देखती रही की कभी न कभी उसे बुलाया जाएगा । लेकिन वो समय नही आया और भाभी जी रिटायर्ड भी हो गई । २००७ में उन के साले साबह ने कोशीश की दीदी और जीजा को मिलाने की लेकिन सफलता नही मिली । मोदी का कहना है के मेरा २४ घंटा सिर्फ देश के लिये ही है । ५ मिनिट भी मै किसी सगे को नही दे सकता । बात भी सही है । अपनी मां के अलावा उसे कोइ सगा मिल नही सकता, अपने सगे भाई भी । उन के सगे चचेरे भाई को मैंने कहा था तू अब नरेंद्रभाई के पास चला जा कहीं अच्छी जगह सेट कर देंगे मैं ईस मंदी मे कितना पगार दे देता हुं । उसने मुझे बताया छोडो सब । वो चले गए उस के बाद मेरा जनम हुआ है । मैंने भी उसे एक ही बार देखा है । उन्होंने मुझे देखा है की नही मालुम नही । अपने भाई को भी घुसने नही देते तो मै क्यों जाउ । अपने घर संसार की बली, भाभी जी के अरमानों की बली, अपने ही संबंधियो से बेरुखी । ये सब नरेंद्र मोदीने किया है । उनका केरेक्टर ढिला है या मजबूत तय जनता कर लेगी ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

प्रिय भाई डाक्टर साहेब आपने देर से ही सही एक सवाल तो उठाया ही है i अगर वास्तव में टीम अन्ना की बात की जाय तो टीम अन्ना एक प्राइवेट लिमिटिड कंपनी से अधिक कुछ नहीं है यह केवल टी.वी. के शेर है और वैसे भी अगर अन्ना को टीम से अलग करके देखा जाय तो उसके बाद टीम के पास क्या बचता है केवल एक बड़ा सा जीरो (शुन्य ) चूँकि इनका कैनवास इतना छोटा है की उसमे पुरे देश में केवल एन० सी ० आर० का क्षेत्र समा पाता है उससे आगे इनको कुछ नजर ही नहीं आता, मुझे तो ऐसा भी लगता है की यह लोग अगर अन्ना हजारे की लोकप्रियता को इसी प्रकार भुनाते रहेंगे ( समय बे समय अनशन पर बैठा कर ) तो भ्रष्टाचार की विरुद्ध जो कथित अभियान ने एक गति पकड़ी थी उसकी असमय ही समापन न हो जाय, मैं यहाँ कारण भी स्पष्ट कर दूँ. पहला यह की अन्ना हजारे किसी इन्डिय अगेंस्ट करप्शन के संस्थापक मेम्बर नहीं है उनको उनकी लोकप्रियता के कारण इस संस्था के डैरक्टर केजरीवाल के द्वारा जोड़ा गया है और यह टीम केवल उनका उपयोग ही करती है ? इसके प्रमाण में आपको एक तथ्य बताना चाहता हूँ, अगस्त २०११ के १३ दिन के आन्दोलन के दौरान जो रुपया एकत्र हुआ उसका विवरण वेव साईट पर उपलब्ध है जिसमे ३०/९/२०११ कुल २,५१,९९,०७८/- दान /चंदे के रूप में मिला जिसमे से १,५७,४९,०३८/ खर्च होना बताया गया है बाकि का ९४,५०,०२०/- रुपया एक संस्था जो कजरीवाल की निजी NGO है उसमे जमा किया गया है अब अगर आन्दोलन अन्ना का है तो पैसा केजरीवाल का कैसे हो गया और जो खर्च बताये गए है वह अपने आप में अपनी कहानी कह देते है ? इसलिए मेरा यह मानना है की यह आन्दोलन दिशा हीन हो चूका है इनकी केवल और केवल इच्छा यह थी की किसी तरह से जनता इनको जान जाए और जब भी यह चुनाव लड़ें और जीत जाय यह कितना भी कहे की यह चुनाव नहीं लड़ेंगे आखिरी मुकाम वहीँ होगा, क्योंकि आज करप्शन से अधिक मिलावट खोरों के विरुद्ध आन्दोलन की जरूरत क्योंकि जिस गावं में इतने दुधारू जानवर नहीं है जितना दूध का उत्पादन उस गावं से होता है ?

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

भूपेन्द्र जी भारत में कश्मीर हो या पकिस्तान के प्रान्त यहाँ सभी के पुरखे हिन्दू थे / पर कहते हें कि नया नया मुल्ला जोर जोर बाघ देता हें सो यही कारण हें कुछ लोग अपना अतीत भूल जी रहें हें / कोन नहीं जानता कभी कश्मीर हिन्दू बहुल था पर उन लोगों ने जीने की मजबूरी वश मुस्लिम धर्म ग्रहण कर लिया / यदि आज भारत , बंगलादेश , पाकिस्तान , अफगानिस्तान के लोग अपने अतीत में झांकें तो पायेंगें कि हम सभी के पुरखे हिन्दू थे / पर माइंड वाश इस तरह से कर दिया गया कि भाई ही भाई के पीछे पड़ा हें /राम मंदिर बन जाने से देश व् राज्य में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हें / टूरिज्म के माध्यम से हिन्दू व् मुसलमान सभी को रोजगार मिल सकता हें / अजमेर में बाबा की दरगाह शरीफ , मक्का मदीना , अमृतसर का सवर्ण मंदिर , रूडकी के पास पिरान कलियर , सहारनपुर के पास शाकुम्बरी देवी , जम्मू में वैष्णो देवी व् अमरनाथ तीर्थ स्थानों में सभी हिन्दू व् मुस्लिम को रोजगार मिल रहा हें व् राज्य व् केंद्र सरकार भी आय अर्जित कर रही हें / आज लोगों की सोच बदलने का हें / यदि ऐसे लोगों को मीडिया व् सरकार द्वारा बताया जाए तो शायद ही कोई राम मंदिर का विरोध करे / देश में हिदू मुस्लिम एकता के लिए व् देश की एकता व् खुशहाली के लिए मंदिर निर्माण में मुसलामानों का तन मन व् धन से सहयोग लिया जाए तो शायद ही कोई मुसलमान हो जो स्वय मंदिर में सहयोग न करे / आखिर वो भी हमारे अपने पूर्वजों की होनहार संताने हें / वो भी राम से इतना ही प्यार करते हें जितना रहीम से / बस बात लोगों की सोच बदलने की हें जिसमें मीडिया का एक अहम् रोल हें

के द्वारा: satish3840 satish3840




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